
News India Live, Digital Desk: महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ और उस पर विराजमान हनुमान जी की चर्चा तो अक्सर होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का भी एक दिव्य रथ था? ज़ी न्यूज़ की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, श्रीकृष्ण के इस रथ का नाम ‘जैत्र’ (Jaitra) था, जिसे ‘गरुड़ध्वज’ के नाम से भी जाना जाता था। यह रथ कोई साधारण वाहन नहीं, बल्कि दिव्य शक्तियों और अद्भुत रहस्यों का पुंज था। आइए जानते हैं श्रीकृष्ण के इस रथ से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य जो शायद ही आपने सुने हों।1. क्यों कहलाता था ‘गरुड़ध्वज’?भगवान श्रीकृष्ण के रथ के ऊपर जो ध्वजा लहराती थी, उस पर साक्षात पक्षीराज गरुड़ विराजमान रहते थे। इसी कारण इसे ‘गरुड़ध्वज’ कहा जाता था। मान्यता है कि गरुड़ देव भगवान विष्णु के वाहन हैं, इसलिए जब भी श्रीकृष्ण युद्ध या शांति के किसी मिशन पर निकलते थे, तो गरुड़ देव स्वयं उनके रथ की ध्वजा पर रहकर रक्षा करते थे।2. जैत्र रथ के चार दिव्य घोड़ेश्रीकृष्ण के रथ को खींचने वाले चार घोड़े भी साधारण नहीं थे। इनके नाम शास्त्रों में इस प्रकार बताए गए हैं:शैब्य: यह सुग्रीव की तरह अत्यंत वेगवान था।सुग्रीव: इसके नाम का अर्थ है ‘सुंदर गर्दन वाला’।मेघपुष्प: इसका रंग आकाश के मेघों जैसा था।बलाहक: यह अपनी शक्ति और साहस के लिए जाना जाता था। इन चारों घोड़ों का रंग अलग-अलग था और इनकी गति मन के समान तीव्र मानी जाती थी।3. रथ का अद्भुत निर्माण और विशेषताएंजैत्र रथ का निर्माण स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था। इस रथ की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह थल के साथ-साथ आकाश और जल में भी चलने में सक्षम था। इसमें लगे पहिये चलते समय एक विशेष प्रकार की गर्जना करते थे, जिसे सुनकर शत्रुओं का हृदय कांप उठता था। रथ का ढांचा स्वर्ण और बहुमूल्य रत्नों से सुसज्जित था, जो अंधेरे में भी सूर्य की तरह चमकता था।4. महाभारत युद्ध और जैत्र रथयद्यपि महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ ‘नंदिघोष’ का संचालन किया और उनके सारथि बने, लेकिन उनके स्वयं के रथ ‘जैत्र’ का उल्लेख भी कई प्रसंगों में आता है। जब श्रीकृष्ण शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे, तब वे इसी दिव्य रथ पर सवार होकर पहुंचे थे। इस रथ की दिव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके साथ चलने वाली वायु भी पवित्र हो जाती थी।5. द्वारका में रहता था यह दिव्य वाहनश्रीकृष्ण का यह रथ उनकी राजधानी द्वारका में रहता था। जब भी द्वारका पर कोई संकट आता या श्रीकृष्ण को किसी असुर का संहार करना होता, तो वे ‘जैत्र’ पर सवार होकर ही युद्ध भूमि में उतरते थे। सुदर्शन चक्र के साथ जब यह रथ चलता था, तो पूरे ब्रह्मांड में इसकी धमक सुनाई देती थी।
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