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News India Live, Digital Desk: देश में पश्मांदा मुसलमानों (Pasmanda Muslims) को ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण देने की मांग एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत के गलियारों में गूंजी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने जो टिप्पणियां की हैं, वे भविष्य की राजनीति और आरक्षण की दिशा तय कर सकती हैं।सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई बहस? (The Courtroom Discussion)पश्मांदा मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्हें ओबीसी (OBC) कोटे में शामिल करने या उनके लिए विशेष प्रावधान करने की याचिका पर सुनवाई हुई।CJI की टिप्पणी: अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उनके पास पर्याप्त डेटा और शोध (Data & Research) मौजूद है जो यह साबित कर सके कि पश्मांदा समुदाय की स्थिति अन्य पिछड़ा वर्गों के समान है।जस्टिस सूर्यकांत का रुख: न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि किसी भी समुदाय को आरक्षण की श्रेणी में लाने के लिए ठोस आधार की आवश्यकता होती है।संविधान का अनुच्छेद 15 और 16: अदालत ने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता, लेकिन पिछड़ेपन के आधार पर वर्गीकरण (Classification) संभव है।कौन हैं पश्मांदा मुसलमान और क्या है उनकी मांग?’पश्मांदा’ एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ है ‘पीछे छूटे हुए’। मुस्लिम समुदाय के भीतर दलित और पिछड़े वर्गों को पश्मांदा कहा जाता है। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:समान अवसर: उन्हें सरकारी नौकरियों और शिक्षा में उचित प्रतिनिधित्व मिले।पिछड़ापन: तर्क दिया गया है कि इस्लाम में जाति व्यवस्था न होने के बावजूद सामाजिक और आर्थिक रूप से यह तबका बेहद पिछड़ा है।मंडल कमीशन की सिफारिशें: पश्मांदा नेता अक्सर मंडल आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हैं।केंद्र और राज्य सरकारों का रुखअदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से भी राय मांगी है। वर्तमान में कुछ राज्यों में मुस्लिम समुदायों की कुछ जातियों को ओबीसी सूची में रखा गया है, लेकिन पश्मांदा समुदाय इसे राष्ट्रीय स्तर पर एक सुव्यवस्थित ढांचे के रूप में लागू कराना चाहता है।
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