
वैश्विक रक्षा कूटनीति और सामरिक समीकरणों में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। तुर्की (तुर्किये) ने वाशिंगटन पर आरोप लगाते हुए कहा है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों और प्रतिबंधों को लेकर खुलेआम दोहरे मापदंड (Double Standards) अपना रहा है। तुर्की की ओर से यह कड़ी प्रतिक्रिया तब आई है जब अमेरिकी वायुसेना ने भारत में आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यासों में अपने सबसे आधुनिक पांचवीं पीढ़ी के F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स को शामिल किया और भारत को इसे देने के संकेत दिए।
तुर्की के रणनीतिक विशेषज्ञों और मीडिया हलकों में इस फैसले को लेकर गहरा असंतोष है। अंकारा का कहना है कि रूसी S-400 ट्रिम्फ एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम खरीदने के नाम पर जिस तरह अमेरिका ने अपने ही नाटो (NATO) सहयोगी देश तुर्की पर कड़े प्रतिबंध ठोके और F-35 प्रोग्राम से बाहर कर दिया, वही नियम भारत के लिए लागू क्यों नहीं किए जा रहे हैं?
S-400 विवाद और तुर्की की ऐतिहासिक नाराजगी
इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2017 और 2019 के बीच हुए सैन्य घटनाक्रमों से जुड़ी हुई हैं। तुर्की, जो अमेरिका नीत सैन्य गठबंधन नाटो का एक संस्थापक और बेहद महत्वपूर्ण सदस्य है, उसने अपनी वायु रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस के साथ अरबों डॉलर की S-400 मिसाइल प्रणाली खरीदने का सौदा किया था।
जब रूस ने तुर्की को S-400 की डिलीवरी शुरू की, तो वाशिंगटन ने इसे नाटो की सुरक्षा और F-35 जेट्स के गुप्त डेटा के लिए गंभीर खतरा बताया। अमेरिका का दावा था कि S-400 प्रणाली में लगे संवेदनशील रडार F-35 की स्टील्थ तकनीक (अदृश्य रहने की क्षमता) का डेटा चुराकर मास्को को भेज सकते हैं।
इसके बाद अमेरिका ने बिना कोई नरमी दिखाए तुर्की के खिलाफ 'काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट' (CAATSA) के तहत कड़े आर्थिक व सैन्य प्रतिबंध लगा दिए। इतना ही नहीं, तुर्की को जॉइंट स्ट्राइक फाइटर (JSF) F-35 डेवलपमेंट प्रोग्राम से रातों-रात बेदखल कर दिया गया। तुर्की ने इस परियोजना में लगभग 1.4 से 1.6 अरब डॉलर का भारी निवेश किया हुआ था और उसके 6 तैयार F-35 जेट्स अमेरिका के हैंगर में ही रुक गए, जो आज तक उसे नहीं मिले।
भारत को लेकर क्यों तिलमिलाया तुर्की?
अब तुर्की के रक्षा विश्लेषकों का सवाल है कि जब भारत ने भी रूस के साथ 5.43 अरब डॉलर का S-400 मिसाइल सौदा किया और अपनी सेना में इसकी चार से पांच स्क्वाड्रन तैनात भी कर ली हैं, तो वाशिंगटन भारत के प्रति इतना मेहरबान क्यों है?
भारत न तो नाटो का सदस्य है और उसने रूस से वही S-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली खरीदी है। इसके बावजूद अमेरिका ने भारत पर न केवल CAATSA प्रतिबंध लगाने से परहेज किया, बल्कि भारत की वायुसेना को अपने सबसे एडवांस्ड लड़ाकू विमान F-35 की पेशकश तक कर डाली है। हाल के समय में भारतीय धरती पर तरंग शक्ति और अन्य अभ्यासों के दौरान अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमानों की गर्जना देखकर तुर्की के राजनयिक गलियारों में अमेरिका के 'दोहरे मापदंड' का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है।
तुर्की के अधिकारियों का कहना है कि यह अमेरिकी विदेश नीति का विरोधाभास है—एक ही हथियार खरीदने पर अपने नाटो सहयोगी को सजा दी जाती है, जबकि दूसरे गैर-नाटो देश को अमेरिका अपने सबसे गुप्त और ताकतवर फाइटर जेट बेचने की वकालत कर रहा है।
वाशिंगटन की मजबूरी और भारत का इंडो-पैसिफिक में कद
अमेरिका के इस कथित दोहरे रवैये के पीछे की भू-राजनीतिक (Geopolitical) वजहों को समझना बेहद जरूरी है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों और सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की स्थिति तुर्की से बिल्कुल अलग है।
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चीन की चुनौती और क्वाड (QUAD): अमेरिका के लिए इस वक्त सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती चीन का बढ़ता सैन्य प्रभाव है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन को संतुलित करने के लिए भारत अमेरिका का सबसे भरोसेमंद और शक्तिशाली भागीदार है। अमेरिका जानता है कि भारत की सैन्य ताकत को कमजोर करना अंततः चीन के ही पक्ष में जाएगा।
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ऐतिहासिक और कानूनी अंतर: भारत ने रूस के साथ S-400 का सौदा 2018 में किया था, जो CAATSA कानून के पूर्ण कड़े प्रावधान लागू होने से पहले की बातचीत पर आधारित था। जबकि तुर्की ने नाटो सदस्य होते हुए चेतावनी के बावजूद इस सौदे को आगे बढ़ाया था।
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रणनीतिक स्वायत्तता: भारत हमेशा से अपनी रक्षा जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय बहुपक्षीय नीति (Strategic Autonomy) अपनाता आया है।
क्या भारतीय वायुसेना में शामिल होगा F-35?
भले ही अमेरिका भारत को F-35 देने के सकारात्मक संकेत दे रहा हो, लेकिन भारतीय वायुसेना (IAF) का रुख इस पर बेहद नपा-तुला और सावधानियों से भरा है। भारत अच्छी तरह जानता है कि अमेरिकी हथियार प्रणालियों के साथ कड़ी परिचालन शर्तें (Operational Conditions) और डेटा एक्सेस की सीमाएं जुड़ी होती हैं। हाल ही में भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ नेतृत्व ने भी स्पष्ट किया है कि जब तक भारत को विमान पर पूर्ण परिचालन नियंत्रण और स्वदेशी तकनीकों को जोड़ने की आजादी नहीं मिलती, तब तक केवल अमेरिकी पेशकश पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।
भारत वर्तमान में अपने स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है और इसके साथ ही फ्रांस के राफेल (Rafale) जैसे परखे हुए प्लेटफॉर्म्स पर भरोसा जता रहा है।
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