
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के एक ग्राहक के साथ हुए गंभीर बैंकिंग और एटीएम फ्रॉड के मामले में उपभोक्ता अदालत ने ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाया है। दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Delhi State Consumer Disputes Redressal Commission) ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अपील को खारिज करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसमें बैंक को पीड़ित ग्राहक की उड़ाई गई 1.30 लाख रुपये की पूरी रकम 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और मुआवजे के साथ वापस लौटाने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने यह फैसला इसलिए सुनाया क्योंकि बैंक ग्राहक की शिकायत के बावजूद न तो एटीएम ट्रांजैक्शन की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रख सका और न ही अदालत के समक्ष कोई ठोस इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या ट्रांजैक्शन लॉग पेश कर पाया।
क्या था पूरा मामला और कैसे उड़े खाते से 1.30 लाख रुपये?
मामले के विवरण के अनुसार, दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में लैब असिस्टेंट के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी का साल 2002 से एसबीआई में सैलरी अकाउंट था। 10 अक्टूबर 2018 को उन्होंने एटीएम से 5,000 रुपये निकाले थे, जिसके बाद उनके खाते में 1,12,472 रुपये बचे थे। 11 अक्टूबर को वेतन के 17,540 रुपये जमा होने के बाद कुल बैलेंस 1,30,012 रुपये हो गया था।
इसके बाद जब ग्राहक ने 22 अक्टूबर 2018 को दोबारा एटीएम से पैसे निकालने की कोशिश की, तो अपर्याप्त बैलेंस (Insufficient Funds) का संदेश आया। जब उन्होंने पासबुक प्रिंट कराई, तो उनके होश उड़ गए। पासबुक एंट्री से पता चला कि 12 अक्टूबर 2018 को उनके खाते से 20,000-20,000 रुपये की चार किस्तों में कुल 80,000 रुपये एटीएम से निकाले गए थे। उसी दिन किसी सोनू नाम के अनजान व्यक्ति के खाते में 40,000 रुपये और 10,000 रुपये (कुल 50,000 रुपये) दो अलग-अलग ट्रांजैक्शन के जरिए ट्रांसफर किए गए थे। इस तरह बिना ग्राहक की जानकारी और अनुमति के कुल 1.30 लाख रुपये उड़ा लिए गए थे।
तुरंत शिकायत के बावजूद बैंक की घोर लापरवाही और खामोशी
पीड़ित ग्राहक ने 22 अक्टूबर 2018 को ही मयूर विहार फेज-I थाने में एफआईआर दर्ज कराई और उसी दिन एसबीआई बैंक शाखा में लिखित शिकायत देकर अनधिकृत ट्रांजैक्शन की जांच करने व एटीएम के सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने की औपचारिक मांग की। इसके बाद 6 मार्च 2019 को ग्राहक ने दोबारा बैंक को पत्र लिखा, लेकिन एसबीआई प्रबंधन की ओर से न तो कोई संतोषजनक जांच की गई और न ही कोई स्पष्ट जवाब दिया गया।
बैंक के इस उपेक्षापूर्ण रवैये से तंग आकर ग्राहक ने इंसाफ के लिए जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। जिला उपभोक्ता आयोग ने बैंक को नोटिस भेजा, लेकिन बैंक वहां भी पेश नहीं हुआ, जिसके बाद जिला आयोग ने ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया था। इस आदेश के खिलाफ एसबीआई ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की थी।
कंज्यूमर कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सीसीटीवी और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पेश करने में विफल रहा बैंक
न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की अध्यक्षता वाली राज्य आयोग की पीठ ने एसबीआई की अपील को सिरे से खारिज करते हुए बैंक की कार्यशैली पर कड़ी फटकार लगाई। आयोग ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि ग्राहक का डेबिट कार्ड कभी चोरी या गुम नहीं हुआ था और न ही उसने किसी तीसरे व्यक्ति को पिन या कार्ड सौंपा था। ऐसे में बैंक का यह प्राथमिक कर्तव्य था कि वह नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और आरबीआई (RBI) के नियमों के तहत एटीएम की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखता और कार्ड क्लोनिंग, स्किमिंग या एटीएम सिस्टम में तकनीकी खामी की जांच करता।
आयोग ने साफ कहा कि इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन लॉग, स्विच रिकॉर्ड्स, एटीएम जर्नल और ऑथेंटिकेशन डिटेल्स का एकमात्र कस्टोडियन बैंक होता है। जब ग्राहक ने समय रहते लिखित शिकायत दर्ज कराई थी, तब भी बैंक ने सीसीटीवी फुटेज या ट्रांसफर वाउचर सुरक्षित क्यों नहीं रखे? बैंक यह साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहा कि 50,000 रुपये का ट्रांसफर ग्राहक द्वारा अधिकृत था या 80,000 रुपये की एटीएम निकासी खुद ग्राहक ने की थी। आयोग ने इसे बैंक की ओर से 'सेवा में गंभीर कमी' (Deficiency in Service) माना।
कंज्यूमर कोर्ट का अंतिम आदेश: ब्याज और हर्जाने के साथ भुगतान का निर्देश
दिल्ली स्टेट कंज्यूमर कमीशन ने एसबीआई को निर्देश दिया कि वह पीड़ित ग्राहक को 1.30 लाख रुपये की पूरी मूल राशि 12 अक्टूबर 2018 से भुगतान की तारीख तक 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ वापस लौटाए। इसके अलावा, ग्राहक को पहुंचे मानसिक उत्पीड़न के एवज में 5,000 रुपये का हर्जाना और कानूनी लड़ाई के खर्च (Litigation Cost) के रूप में 5,000 रुपये अतिरिक्त देने का आदेश भी पारित किया गया।
यह अदालती फैसला देश के करोड़ों बैंकिंग और एटीएम उपयोगकर्ताओं के लिए एक बड़ी नजीर है। यदि किसी बैंक ग्राहक के खाते से अनधिकृत या फर्जी ट्रांजैक्शन होता है और ग्राहक समय रहते बैंक को सूचित करता है, तो लेन-देन की वैधता साबित करने और सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत करने की पूरी कानूनी जिम्मेदारी बैंक की होती है।
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