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News India Live, Digital Desk: भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सबसे भव्य और महान फिल्म की बात होती है, तो ‘मुगल-ए-आजम’ (Mughal-E-Azam) का नाम सबसे ऊपर आता है। इस फिल्म के गानों ने न केवल संगीत की दुनिया में इतिहास रचा, बल्कि इसके गीतकार शकील बदायूंनी (Shakeel Badayuni) ने अपनी कलम से मजहब की दीवारों को गिराकर भारत की साझा संस्कृति (Syncretic Culture) की एक अनूठी मिसाल पेश की।आज 11 मार्च 2026 को हम उस महान फनकार को याद कर रहे हैं, जिन्होंने एक मुस्लिम होते हुए हिंदी सिनेमा को अब तक के सबसे सुंदर और भक्तिपूर्ण भजन दिए।’मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे’: कृष्ण भक्ति का अद्भुत संगमफिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में जब मधुबाला (अनारकली) भगवान कृष्ण के इस भजन पर नृत्य करती हैं, तो दृश्य जादुई हो जाता है।मुस्लिम कलम, हिंदू आस्था: शकील बदायूंनी ने ‘मोहे पनघट पे…’ को इतनी श्रद्धा और बारीकी से लिखा कि आज भी इसे सर्वश्रेष्ठ कृष्ण भजनों में गिना जाता है।नौशाद और शकील की जोड़ी: संगीत सम्राट नौशाद और शकील की जोड़ी ने इस फिल्म में राग आधारित संगीत और रूहानी शब्दों का जो मेल किया, वह बेमिसाल है।सिर्फ ‘मुगल-ए-आजम’ ही नहीं, इन फिल्मों में भी रचा इतिहासशकील बदायूंनी केवल दरबारी या रूमानी गीत लिखने के लिए ही नहीं जाने जाते थे। उनकी कलम से निकले भजनों ने हर किसी को मंत्रमुग्ध किया:बैजू बावरा: इस फिल्म का भजन ‘मन तड़पत हरी दर्शन को आज’ सुनकर कोई नहीं कह सकता था कि इसे लिखने वाला एक मुस्लिम (शकील), संगीत देने वाला एक मुस्लिम (नौशाद) और गाने वाला भी एक मुस्लिम (मोहम्मद रफी) है।गंगा जमुना: ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’ जैसे शास्त्रीय भजनों ने शकील की बहुमुखी प्रतिभा को साबित किया।शकील बदायूंनी: शब्दों के जादूगरबदायूं (उत्तर प्रदेश) में जन्मे शकील ने उर्दू शायरी और हिंदी शब्दों का ऐसा तालमेल बिठाया कि उनके गीत आम आदमी की जुबान पर चढ़ गए। ‘प्यार किया तो डरना क्या’ जैसा इंकलाबी गाना हो या ‘बेकस पे करम कीजिए’ जैसी पुरखुलूस नात, शकील ने हर भाव को अमर कर दिया।गंगा-जमुनी तहजीब की विरासत: शकील का लेखन आज के दौर में भी प्रासंगिक है। वह बताते हैं कि कला का कोई धर्म नहीं होता। उनकी रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि एक कलाकार की संवेदनाएं किसी भी सीमा को पार कर ईश्वर या अल्लाह तक पहुंच सकती हैं।
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