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UP Panchayat Elections 2026: ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर हाईकोर्ट की रोक के खिलाफ डबल बेंच जाएगी योगी सरकार, जानें क्या है पूरा विवाद

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों (UP Panchayat Elections) को लेकर सियासी और कानूनी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा निवर्तमान ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने और उन्हें ही 'प्रशासक' (Administrator) नियुक्त करने के राज्य सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने के बाद अब सरकार ने इसके खिलाफ बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाने का मन बना लिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने 25 जून 2026 के अपने सख्त आदेश में सरकार के इस कदम को प्रथम दृष्टया असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट का स्पष्ट कहना है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को किसी भी रूप में प्रशासक की भूमिका में नहीं रखा जा सकता। इस आदेश के खिलाफ अब राज्य सरकार अगले सप्ताह हाईकोर्ट की डबल बेंच (Double Bench) या फुल बेंच में अपील दायर करने की तैयारी कर रही है।

क्या पूरा मामला क्या है और क्यों सरकार ने प्रधानों को प्रशासक बनाया?

उत्तर प्रदेश की लगभग 57,000 से अधिक ग्राम पंचायतों का पांच साल का कानूनी कार्यकाल 26 मई 2026 को पूरी तरह समाप्त हो चुका है। नियमतः कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए थे, लेकिन प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण की प्रक्रिया पूरी न होने के कारण चुनावों में देरी हो गई।

गांवों में विकास कार्य और सरकारी योजनाएं न रुकें, इसके लिए योगी सरकार ने 25 मई को एक अधिसूचना जारी कर निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही अगले 6 महीने या चुनाव होने तक के लिए 'प्रशासक' नियुक्त कर दिया था। सरकार के इसी फैसले को अरविंद राठौर और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार को तगड़ा झटका दिया है।

हाईकोर्ट का रुख: 5 साल से ज्यादा नहीं बढ़ सकता कार्यकाल, 13 जुलाई तक मांगी चुनाव की रूपरेखा

  • सांविधानिक दायरा: हाईकोर्ट ने अपने आदेश में भारत के संविधान के अनुच्छेद 243 (E) और 243 (K) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिति में चुनी हुई पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टालना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।

  • अनिवार्य आदेश: कोर्ट ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) को सख्त निर्देश देते हुए आगामी 13 जुलाई 2026 (अगली सुनवाई की तिथि) तक उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने की पूरी विस्तृत समय-सारणी और रूपरेखा कोर्ट के समक्ष पेश करने को कहा है।

सरकार की कानूनी दलील: उप्र पंचायतीराज अधिनियम 1947 की धारा 12(3-A) का सहारा

शासन के उच्चपदस्थ कानूनी सूत्रों और विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के पास इस फैसले को सही ठहराने का एक मजबूत कानूनी आधार है:

  • वैकल्पिक व्यवस्था का नियम: 'उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम, 1947' की धारा 12 की उपधारा (3-A) मुख्य रूप से असाधारण और अपरिहार्य परिस्थितियों में चुनाव टलने की स्थिति से संबंधित है। यह धारा राज्य सरकार को यह वैधानिक शक्ति देती है कि यदि लोकहित में समय पर चुनाव संभव न हो, तो वह वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था (जैसे प्रशासक की नियुक्ति) कर सकती है।

  • अपील का आधार: चूंकि अप्रैल 1994 में ऐतिहासिक संशोधन के जरिए जोड़ी गई इस उपधारा (3-A) को आज तक कानूनन हटाया नहीं गया है, इसलिए सरकार इसी एक्ट को अपना ढाल बनाएगी। सरकार का तर्क है कि कानून में कहीं यह अनिवार्य नहीं लिखा है कि प्रशासक केवल सरकारी अधिकारी (जैसे बीडीओ या एडीओ) ही हो सकता है, जनहित में निवर्तमान प्रधानों को भी यह जिम्मेदारी दी जा सकती है।

समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग को पक्षकार बनाने के आदेश को भी मिलेगी चुनौती

हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार द्वारा गठित 'उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग' को भी मुकदमे में पक्षकार (Party) बनाने की अनुमति दी है। सरकार इस आदेश को भी चुनौती देने जा रही है।

आयोग के अध्यक्ष और इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस राम औतार सिंह का स्पष्ट कहना है कि 'कमिशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट' (Commission of Inquiry Act) की धारा-9 के तहत किसी भी जांच या सर्वे आयोग को किसी दीवानी या संवैधानिक मुकदमे में सीधे तौर पर पार्टी नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए आयोग को पक्षकार बनाने के फैसले के खिलाफ भी सरकार अपील करेगी।

नवंबर 2026 से पहले संभव नहीं हैं चुनाव? आयोग को रिपोर्ट तैयार करने में लगेगा समय

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के 'ट्रिपल टेस्ट' (Triple Test) के दिशा-निर्देशों के तहत उत्तर प्रदेश सरकार ने 18 मई 2026 को इस समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है। आयोग का मुख्य कार्य राज्य के सभी 75 जिलों में ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर जाकर ओबीसी (OBC) आबादी के सटीक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आंकड़े जुटाना और उनका भौतिक सत्यापन करना है।

आयोग के अध्यक्ष जस्टिस राम औतार सिंह के अनुसार:

"हमने राज्य के सभी 75 जिलों के जिलाधिकारियों (DM) से पिछड़े वर्ग की आबादी के प्रारंभिक आंकड़े प्राप्त कर लिए हैं। आयोग की टीम ने मेरठ, हापुड़ और बागपत जैसे जिलों का जमीनी दौरा कर सत्यापन कार्य भी शुरू कर दिया है। चूंकि सीटों का सही आरक्षण तय करने के लिए हमें प्रदेश के सभी 75 जिलों का सघन दौरा करना होगा, इसलिए इस पूरी वैज्ञानिक और अनुभवजन्य जांच (Empirical Investigation) को पूरा करने में कम से कम 6 महीने का समय लगेगा। आयोग अपनी अंतिम और प्रामाणिक रिपोर्ट नवंबर 2026 तक ही शासन को सौंप पाएगा।"