
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसेambitiousयोजनाओं में से एक,प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY),पर अब सवाल उठने लगे हैं. यह योजना इसलिए शुरू की गई थी ताकि देश के गरीब से गरीब आदमी का भी अपना बैंक खाता हो और सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे उस तक पहुंच सके. करोड़ों लोगों के खाते खुले भी,लेकिन अब एक चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आ रही है.करोड़ों खाते हो गए बेकार,क्यों?एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार,सितंबर2025तक देश में कुल54.55करोड़ जन-धन खाते हैं,लेकिन इनमें से14.28करोड़ खाते’निष्क्रिय’हो चुके हैं. आसान भाषा में कहें तो इन खातों में पिछले दो साल से कोई लेन-देन ही नहीं हुआ है. यह आंकड़ा कुल खातों का लगभग26%है,यानी हर चार में से एक खाता अब इस्तेमाल में नहीं है. पिछले साल यह आंकड़ा21%था,जो दिखाता है कि यह समस्या तेजी से बढ़ रही है.सबसे हैरानी की बात यह है कि इस समस्या का असर बड़े-बड़े सरकारी बैंकों पर ज्यादा दिख रहा है. बैंक ऑफ इंडिया के33%और यूनियन बैंक के32%जन-धन खाते बंद पड़े हैं. देश के सबसे बड़े बैंक,भारतीय स्टेट बैंक (SBI)में भी निष्क्रिय खातों का आंकड़ा19%से बढ़कर25%हो गया है.आखिर’निष्क्रिय’क्यों हो जाते हैं ये खाते?भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)का नियम है कि अगर किसी बैंक खाते में दो साल तक कोई भी ट्रांजैक्शन (पैसे जमा करना या निकालना) नहीं होता है,तो उसे’निष्क्रिय’या’डोरमेंट’मान लिया जाता है. जन-धन खातों के मामले में इसके पीछे कुछ बड़ी वजहें हैं:KYCकी समस्या:कई खाताधारकों नेअपनाKYC (नो योर कस्टमर) अपडेट नहीं कराया है.जागरूकता की कमी:खासकर ग्रामीण इलाकों में लोगों को यह नहीं पता कि खाते को चालू रखने के लिए लेन-देन करना जरूरी है.आर्थिक गतिविधियों की कमी:कुछ लोगों के पास नियमित आय नहीं होती,जिससे वे खाते का इस्तेमाल नहीं कर पाते.क्या है सरकार का अगला कदम?सरकार इस समस्या को लेकर गंभीर है. वित्त मंत्रालय ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे खाताधारकों से संपर्क करें और उनकीRe-KYCप्रक्रिया पूरी करवाएं. इसके साथ ही,ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में वित्तीय साक्षरता यानी बैंकिंग से जुड़ी जानकारी को बढ़ाने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं,ताकि लोग अपने खातों का सही इस्तेमाल करना सीख सकें.इसमें कोई शक नहीं कि जन-धन योजना ने करोड़ों लोगों को पहली बार बैंकिंग सिस्टम से जोड़कर एक बड़ी क्रांति की है. लेकिन अब असली चुनौती इन खातों को सिर्फ खुला रखना नहीं,बल्कि इन्हें चालू रखना है. सरकार और बैंकों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि हर खाताधारक अपने खाते का सही लाभ उठा सके,वरना वित्तीय समावेशन का यह बड़ा सपना अधूरा रह जाएगा.
UK News