
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और पश्चिम एशिया के सुलगते भू-राजनीतिक परिदृश्य से एक बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। क्षेत्रीय कूटनीति के मोर्चे पर चल रही उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर जब आधिकारिक दौरे पर ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे, तो वहां उन्हें ईरान के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से तीखी और दो-टूक बातें सुनने को मिलीं। ईरानी अधिकारियों ने दो-टूक शब्दों में पाकिस्तान को साफ कर दिया कि अमेरिका पहले अपने आक्रामक और एकतरफा रवैये में सुधार करे, तभी क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक बातचीत के किसी सार्थक परिणाम की उम्मीद की जा सकती है। एक तरफ जहां पाकिस्तान पश्चिम एशिया और अमेरिका के बीच मध्यस्थता या कूटनीतिक संतुलन साधने की जुगत में लगा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से जुड़े एक वरिष्ठ मंत्री ने बेहद आक्रामक तेवर दिखाते हुए खुलेआम यह चेतावनी दे डाली है कि यदि वाशिंगटन के हितों के खिलाफ कोई कदम उठाया गया, तो तेहरान पर फिर से बड़ा सैन्य हमला किया जा सकता है। इन दोनों मोर्चों पर एक साथ सामने आए बयानों ने वैश्विक कूटनीति का पारा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है और हर किसी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस तनातनी का आने वाले समय में दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा।
असीम मुनीर के तेहरान दौरे के पीछे की छिपी हुई राजनीतिक और सामरिक मंशा
पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर का तेहरान दौरा ऐसे समय में हुआ है जब मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर है। पाकिस्तान हमेशा से कूटनीतिक संतुलन का नाटक करते हुए अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने आर्थिक संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है, लेकिन साथ ही ईरान जैसे पड़ोसी देश के साथ अपनी सीमाई और व्यापारिक मजबूरियों के कारण वह तेहरान को भी पूरी तरह नाराज नहीं करना चाहता। जब मुनीर ने तेहरान के उच्चाधिकारियों से मुलाकात की, तो उन्होंने क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के खात्मे जैसे पारंपरिक मुद्दों पर चर्चा करनी चाही, लेकिन ईरानी कूटनीति ने तुरंत पासा पलटते हुए अमेरिका की दोहरे मापदंड वाली नीतियों पर सीधा प्रहार कर दिया। ईरान ने स्पष्ट कर दिया कि जो देश खुद अमेरिका के इशारों पर अपनी नीतियां तय करते हैं, वे पश्चिम एशिया की शांति और सुरक्षा के रहनुमा बनने का दिखावा न करें। तेहरान ने मुनीर के सामने यह साफ कर दिया कि जब तक वाशिंगटन अपनी साम्राज्यवादी नीतियों और प्रतिबंधों के रवैये को नहीं बदलता, तब तक किसी भी बाहरी मध्यस्थता का कोई वजूद नहीं हो सकता।
ट्रंप प्रशासन की वापसी और ईरान पर मंडराते नए सैन्य हमलों के काले बादल
दूसरी ओर, वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरें पश्चिम एशिया की शांति के लिए बेहद डरावनी हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता संभालने के बाद से ही उनकी पुरानी और कट्टर 'मैक्सिमम प्रेशर' (Maximum Pressure) नीति की वापसी हो चुकी है। ट्रंप प्रशासन के एक प्रभावशाली मंत्री ने हाल ही में मीडिया के सामने एक बेहद आक्रामक बयान देते हुए कहा कि अमेरिका अपने और अपने सहयोगियों के सामरिक हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने से नहीं हिचकिचाएगा। उन्होंने खुलेआम यह चेतावनी दी कि यदि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रमों और क्षेत्रीय छद्म युद्धों (Proxy Wars) को बंद नहीं किया, तो अमेरिका और उसके सहयोगी मिलकर तेहरान पर एक बार फिर से विनाशकारी सैन्य हमला करने से पीछे नहीं हटेंगे। इस प्रकार की युद्धोन्मादी बयानबाजी ने खाड़ी देशों में खलबली मचा दी है, क्योंकि हर कोई जानता है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच सीधी सैन्य भिड़ंत होती है, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा पूरी दुनिया को कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों और आर्थिक मंदी के रूप में भुगतना पड़ेगा।
ईरान और पाकिस्तान के बीच बदलते समीकरण और भू-राजनीतिक चुनौतियां
ईरान और पाकिस्तान की सीमाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और दोनों देशों के बीच बलूचिस्तान जैसे संवेदनशील इलाकों में सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा बलों की आवाजाही को लेकर अक्सर तनाव की स्थिति बनी रहती है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख का यह दौरा इस बात को साबित करता है कि रावलपिंडी (पाकिस्तानी सेना मुख्यालय) अपनी आंतरिक आर्थिक बदहाली और बाहरी दबावों से उबरने के लिए पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों में अपनी धमक बनाए रखना चाहता है। हालांकि, ईरान जैसी क्षेत्रीय महाशक्ति द्वारा पाकिस्तानी जनरल को इस तरह दो-टूक जवाब देना यह बताता है कि इस्लामाबाद की कूटनीतिक हैसियत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार कमजोर हो रही है। ईरान अच्छी तरह समझता है कि पाकिस्तान की सेना अमेरिका के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होकर कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकती, इसलिए तेहरान ने मुनीर के सामने अपनी स्थिति बिल्कुल क्रिस्टल-क्लियर कर दी कि वह किसी भी बाहरी दबाव या अमेरिकी धमकियों के आगे झुकने वाला नहीं है।
वैश्विक शांति पर मंडराता खतरा और भारत सहित अन्य देशों की पैनी नजर
इस पूरे भू-राजनीतिक ड्रामे का असर केवल मध्य एशिया या दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी ग्लोबल इकोनॉमी और सिक्योरिटी को प्रभावित करने की ताकत रखता है। भारत जैसे देश के लिए, जिसके संबंध ईरान (चाबहार बंदरगाह के संदर्भ में) और अमेरिका दोनों के साथ रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय प्रवासी काम करते हैं और देश की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक उसी क्षेत्र से पूरी होती हैं। यदि ट्रंप प्रशासन के मंत्रियों की चेतावनियों के बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के हालात बनते हैं, तो भारत के सामने भी कूटनीतिक संतुलन साधने की बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी। दुनिया भर के देश इस समय संयम बरतने की अपील कर रहे हैं, लेकिन वाशिंगटन के आक्रामक तेवर और तेहरान के दो-टूक जवाब ने यह साबित कर दिया है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की धरती पर कोई बड़ा भू-राजनीतिक धमाका देखने को मिल सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय शांति के सभी समीकरण पूरी तरह उलट-पलट सकते हैं।
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