
सनातन हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए तीज के व्रतों का विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना गया है। हरियाली तीज के बाद भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज (Kajari Teej) का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। इसे कजली तीज, सातुड़ी तीज और बूढ़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है।
यह व्रत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश समेत पूरे उत्तर भारत में बड़े उल्लास के साथ रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं अविवाहित कन्याएं सुयोग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए भगवान शिव, माता पार्वती और नीमड़ी माता की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं।
कजरी तीज 2026 की सही तारीख और पंचांग गणना
वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारंभ 29 अगस्त 2026 की दोपहर से होगा और इसका समापन 30 अगस्त 2026 की दोपहर में होगा। उदयातिथि के नियम और चंद्रोदय की पूजा के महत्व को देखते हुए कजरी तीज का मुख्य व्रत 30 अगस्त 2026 (रविवार) को ही रखा जाएगा।
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तृतीया तिथि प्रारंभ: 29 अगस्त 2026 को दोपहर 03:44 बजे से
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तृतीया तिथि समाप्त: 30 अगस्त 2026 को दोपहर 01:52 बजे तक
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उदयातिथि अनुसार व्रत तिथि: 30 अगस्त 2026 (रविवार)
पूजा का शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय
कजरी तीज के दिन भगवान शिव-गौरी और नीमड़ी माता की पूजा के लिए कई शुभ योग बन रहे हैं:
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प्रातःकालीन पूजा मुहूर्त: सुबह 07:34 बजे से दोपहर 12:21 बजे तक (शुभ, लाभ और अमृत चौघड़िया)
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शाम का प्रदोष काल मुहूर्त: शाम 06:42 बजे से रात 08:58 बजे तक
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चंद्रोदय का समय (Moonrise Time): रात 08:48 बजे (विभिन्न शहरों में समय में 5 से 10 मिनट का अंतर हो सकता है)
(नोट: कजरी तीज का व्रत रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने और छलनी से दर्शन करने के बाद ही पूर्ण माना जाता है।)
कजरी तीज की सरल और प्रामाणिक पूजा विधि
कजरी तीज के दिन नीम की डाल (नीमड़ी माता) की प्रतिष्ठा कर पूजा करने की विशेष परंपरा है। पूजन की पूरी विधि इस प्रकार है:
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तैयारी और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त हों और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर निर्जला व्रत का संकल्प लें।
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तालाब और नीमड़ी स्थापना: घर के पूजा स्थल की दीवार के पास मिट्टी और गोबर से एक छोटा सा गोल तालाब (तलाई) बनाएं। उसमें कच्चा दूध और गंगाजल भरें। किनारे पर नीम की एक हरी टहनी (नीमड़ी माता) स्थापित करें।
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सोलह श्रृंगार अर्पण: माता पार्वती और नीमड़ी माता को रोली, अक्षत, सिंदूर, काजल, मेहंदी और 16 श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
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सत्तू और मालपुए का भोग: कजरी तीज पर जौ, गेहूं, चने और चावल के आटे में घी व बूरा मिलाकर बनाए गए सत्तू (पिंड) का विशेष भोग लगाया जाता है। साथ ही मौसमी फल जैसे ककड़ी, केला और सेब अर्पित करें।
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दीपक और आरती: घी का दीपक जलाकर कजरी तीज की व्रत कथा सुनें या पढ़ें और अंत में भगवान शिव-पार्वती की आरती उतारें।
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चंद्रमा को अर्घ्य: रात्रि में चंद्रमा के उदय होने पर चांदी के पात्र में जल, कच्चा दूध, रोली और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। चंद्र दर्शन के बाद पति के पैर छूकर आशीर्वाद लें और फिर सत्तू का पारण कर व्रत संपन्न करें।
कजरी तीज के दिन सत्तू के महत्व का आध्यात्मिक रहस्य
राजस्थान और उत्तर भारत में इस पर्व को सातुड़ी तीज भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं विभिन्न प्रकार के अनाजों का सत्तू तैयार करती हैं और उसे सुंदर आकार देकर चांदी के सिक्के या बादाम से सजाती हैं। शाम को नीमड़ी माता की पूजा के समय दूध से भरे तालाब में सत्तू, ककड़ी, जलते दीपक और सोने-चांदी के आभूषणों की परछाई (छाया) देखने की अनूठी परंपरा है। यह मान्यता है कि जल में इन शुभ प्रतीकों की छाया देखने से जीवन में दांपत्य सुख, सौभाग्य और आरोग्य की वृद्धि होती है।
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