
नेपाल की हालिया त्रासदी को केवल एक सामान्य ग्लेशियर टूटने की घटना मान लेना भूवैज्ञानिक और मौसमी बदलावों के बड़े खतरे को नजरअंदाज करना होगा। यह घटना इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करती है कि हिमालयी क्षेत्र में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। हैरानी की बात यह है कि अब कई पर्वतीय क्षेत्रों में कुल मानसूनी बारिश का औसत कम दर्ज किया जा रहा है, लेकिन जब बारिश होती है तो वह बहुत ही कम समय में अत्यधिक और विनाशकारी रूप ले लेती है। इसी अनिश्चितता के कारण अचानक आने वाली बाढ़ (फ्लैश फ्लड), बड़े पैमाने पर भूस्खलन और मलबे का तेज बहाव जैसी आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
कम बारिश में भी क्यों बेकाबू हो रही हैं हिमालयी नदियां?
विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय क्षेत्र के लिए अब सबसे बड़ा खतरा कुल वर्षा की मात्रा से ज्यादा उसके अचानक और तीव्र रूप में बरसने का है। जब पहाड़ों पर कुछ ही घंटों में बहुत भारी बारिश होती है, तो उसके तुरंत बाद बड़े पैमाने पर भूस्खलन (Landslides) शुरू हो जाते हैं। इन भूस्खलनों की वजह से अक्सर नदियां प्राकृतिक रूप से अवरुद्ध हो जाती हैं और उनके पीछे पानी का भारी दबाव बनता रहता है। जब यह प्राकृतिक मलबा या बांध अचानक टूटता है, तो पानी, कीचड़ और बड़े-बड़े चट्टानी पत्थरों का सैलाब मैदानी और तराई क्षेत्रों की ओर बेहद तेजी से बढ़ता है। एक आपदा अपने पीछे कई अन्य छोटी-बड़ी आपदाओं को जन्म दे रही है, जिसका गंभीर असर पहाड़ों से लेकर नीचे मैदानी इलाकों तक देखने को मिल रहा है।
मौसम के इस नए मिजाज पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी 'स्काईमेट' के हालिया आंकड़ों और आकलन में भी इस बड़े बदलाव की पुष्टि की गई है। एजेंसी ने वर्ष 2026 के पूरे मानसून सीजन के दौरान देश में सामान्य से लगभग 85 प्रतिशत बारिश रहने का अनुमान जताया है, जबकि सितंबर महीने में भी करीब 80 प्रतिशत बारिश की संभावना है। इसके बावजूद कुछ खास पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यधिक तीव्र बारिश के दौर आने की पूरी आशंका बनी हुई है। मौसम विशेषज्ञ महेश पलावत का कहना है कि वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार काफी तेज हो गई है। हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से न केवल बर्फ और ग्लेशियर प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि पहाड़ों की प्राकृतिक आंतरिक स्थिरता भी कमजोर हो रही है।
दो दशकों में एक डिग्री तक बढ़ा हिमालय का तापमान
जलवायु परिवर्तन के इस गंभीर संकट को आईआईटी खड़गपुर की एक रिपोर्ट में भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों के दौरान हिमालय और आसपास के कई क्षेत्रों के तापमान में लगभग एक डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) इसी रफ्तार से जारी रही, तो आने वाले 70 वर्षों में हिमालय-काराकोरम क्षेत्र की लगभग 65 प्रतिशत बर्फ पिघल सकती है। इस स्थिति में नदियों में पानी के बहाव का स्वरूप और उसकी मात्रा पूरी तरह बदल जाएगी, जिससे भविष्य में जल संकट और बाढ़ दोनों का खतरा बढ़ सकता है।
हाइपर-लोकल पूर्वानुमान और सतर्कता की जरूरत
बदलते मौसम के इन खतरों को समय रहते भांपने के लिए भारत मौसम विभाग (IMD) द्वारा अब 'हाइपर-लोकल' पूर्वानुमान पर विशेष जोर दिया जा रहा है। आधुनिक रडार, अंतरिक्ष आधारित उपग्रहों, स्वचालित मौसम केंद्रों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से अब बेहद छोटे और विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों के लिए सटीक चेतावनी जारी करने की तकनीक विकसित की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल कुल वर्षा के आंकड़ों के आधार पर किसी क्षेत्र की सुरक्षा का आकलन करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थानीय स्तर पर बादलों के फटने और अचानक आने वाली आपदाओं से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन प्रणालियों को और अधिक अत्याधुनिक बनाना होगा।
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