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क्या ‘इस्लामिक नाटो’ अमेरिका की बड़ी चाल है? मक्का समझौते में अभी और किन देशों की होगी एंट्री

पश्चिम एशिया की राजनीति में इन दिनों एक बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए 'मक्का समझौते' को दुनिया भर में 'इस्लामिक नाटो' की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। नाटो की तर्ज पर तैयार किए गए इस सैन्य और रक्षा समझौते के तहत यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे सभी देशों पर हमला माना जाएगा। इस नए और ताकतवर गठबंधन को लेकर दुनिया भर के रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच बहस छिड़ गई है कि क्या इसके पीछे अमेरिका की कोई सोची-समझी चाल है?

क्या मक्का समझौते के पीछे छिपी है अमेरिका की कोई बड़ी रणनीति?

सऊदी अरब के राजनीतिक वैज्ञानिक मंसूर अलमार्जूकी का मानना है कि यह मक्का समझौता किसी बहुत बड़ी वैश्विक व्यवस्था की एक मजबूत नींव है। वहीं, रणनीतिक विशेषज्ञ तारा कार्था ने भी इस समझौते में अमेरिका की भूमिका को लेकर बड़ा सवाल उठाया है। अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद जो विल्सन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए दावा किया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मक्का समझौते को कराने में पर्दे के पीछे से पूरी मदद की थी।

सांसद जो विल्सन के मुताबिक, सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान का यह आपसी रक्षा समझौता मिडिल ईस्ट में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने की ट्रंप प्रशासन की कोशिशों का ही एक हिस्सा है। हालांकि, इस समझौते को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। शिया विद्वान आगा सैयद जवाद नकवी के नेतृत्व में कई शिया मौलवियों ने इसे सीधे तौर पर 'अमेरिका-अरब की खतरनाक साजिश' करार दिया है। उनका आरोप है कि इस समझौते का असली मकसद पाकिस्तान को ईरान के साथ चल रहे तनाव और भविष्य के पश्चिम एशिया युद्धों में मोहरे की तरह इस्तेमाल करना है।

मक्का समझौते में अभी किन-किन नए देशों की हो सकती है एंट्री?

तुर्की की तरफ से हाल ही में ऐसे स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि यह समझौता केवल सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। आने वाले समय में इस सैन्य गठबंधन का दायरा और अधिक बढ़ाया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कई अन्य देशों को भी इसके दायरे में लाया जाएगा।

रणनीतिक जानकारों के अनुसार, अफ्रीका की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में शुमार मिस्र इस गठबंधन में शामिल होने वाला अगला सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। मिस्र के पास 4.4 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिक, आधुनिक टैंक और एक मजबूत वायु व नौसेना है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में कतर और कुवैत को भी इस समूह का हिस्सा बनने के लिए सबसे आगे माना जा रहा है। जॉर्डन, अजरबैजान और सीरिया के भी इस नए रक्षा ढांचे में शामिल होने की प्रबल संभावनाएं जताई जा रही हैं।

सऊदी का पैसा, तुर्की के हथियार और पाकिस्तान की परमाणु ताकत

इस समय मक्का समझौते में शामिल तीनों देश अपनी-अपनी खासियतों के साथ योगदान दे रहे हैं। सऊदी अरब इस गठबंधन को अपनी बेजोड़ आर्थिक ताकत और पश्चिम एशिया की सबसे आधुनिक वायु सेना दे रहा है, जबकि तुर्की के पास नाटो से प्रशिक्षित एक बेहद मजबूत सेना है। इसके अलावा, पाकिस्तान के पास परमाणु हथियारों की ताकत है।

यदि आने वाले दिनों में मिस्र, कतर और कुवैत जैसे देश भी इस गठबंधन से जुड़ जाते हैं, तो इसकी सैन्य और रणनीतिक ताकत में बेतहाशा इजाफा हो जाएगा। मिस्र की विशाल सेना और स्वेज नहर के पास उसकी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति इस पूरे समूह को वैश्विक स्तर पर एक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर सकती है।