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‘जब तक सामाजिक भेदभाव रहेगा, तब तक चलेगा आरक्षण’: डॉ. आंबेडकर का हवाला देकर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बताया कब खत्म होगा रिजर्वेशन

देश में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था को लेकर जारी बहसों और विभिन्न राज्यों में उठ रही मांगों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक बार फिर संगठन के रुख को पूरी तरह से स्पष्ट किया है। मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर (NMACC) में आयोजित 'इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस' (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ के अवसर पर युवाओं को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि भारत में आरक्षण की व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक कि समाज से छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का पूरी तरह से उन्मूलन नहीं हो जाता। 'जेन-जी' (Gen Z) और 'जेन-अल्फा' के दो हजार से अधिक युवाओं के साथ एक विशेष संवाद सत्र के दौरान जब उनसे यह तीखा सवाल पूछा गया कि क्या अब शिक्षा और रोजगार में आरक्षण की सीमा को कम करने या इसे समाप्त करने का समय आ गया है, तो भागवत ने सीधे 'हां' या 'ना' में जवाब देने के बजाय संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की दूरदर्शिता का हवाला दिया।

सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, "आरक्षण के विषय में हमें यह समझना होगा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने इसके बारे में क्या सोच रखी थी। यदि हम ईमानदारी से उनकी सलाह और उनके द्वारा बताए गए सिद्धांतों का पालन करें, तो कोई समस्या या विवाद पैदा ही नहीं होगा। आरक्षण कोई आर्थिक योजना नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से सामाजिक कारणों और सामाजिक विषमता को दूर करने के लिए लाया गया एक माध्यम है। जब तक समाज के किसी भी वर्ग में सामाजिक भेदभाव और असमानता की भावना मौजूद है, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी और यह जारी रहना चाहिए।" संघ प्रमुख का यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब देश के कई हिस्सों में आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने या इसे समाप्त करने को लेकर छिटपुट विरोध-प्रदर्शन और ऑनलाइन अभियान चलाए जा रहे हैं। भागवत के इस स्पष्ट रुख ने एक बार फिर दोहरा दिया है कि आरएसएस सामाजिक समरसता और समानता के लिए आरक्षण का पूर्ण समर्थन करता है।

'जिन्हें फायदा मिला, वे बड़ा दिल दिखाएं': आंबेडकर के विचार और सामाजिक एकता का संदेश

संवाद के दौरान मोहन भागवत ने आरक्षण का लाभ उठा चुके समृद्ध वर्गों और व्यक्तियों से एक विशेष अपील भी की। उन्होंने कहा कि जिन परिवारों या व्यक्तियों ने आरक्षण की व्यवस्था का लाभ उठाकर सामाजिक और आर्थिक रूप से खुद को मजबूत कर लिया है, उन्हें अब 'बड़ा दिल' दिखाते हुए इस लाभ को स्वेच्छा से छोड़ देना चाहिए ताकि उनके ही समाज के उन पिछड़े और वंचित लोगों तक यह लाभ पहुंच सके जो अब तक इससे अछूते रहे हैं। भागवत ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि अब आरक्षित श्रेणियों के भीतर से ही ऐसी आवाजें और सकारात्मक सोच उभरने लगी हैं कि जिन्हें लाभ मिल चुका है, वे दूसरों को आगे बढ़ने का अवसर दें। उन्होंने कहा कि यह सोच एक स्थायी समाधान की ओर बढ़ने का संकेत है, क्योंकि आरक्षण का अंतिम उद्देश्य समाज के हर अंतिम व्यक्ति का उत्थान करना है, न कि केवल कुछ सीमित परिवारों तक इसे सीमित रखना।

संघ प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में आरक्षित वर्गों के भीतर 'उप-वर्गीकरण' (Sub-categorisation) को लेकर दी गई व्यवस्था और टिप्पणियों का भी समर्थन किया। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न राज्यों से उप-वर्गीकरण की मांग इसलिए उठ रही है क्योंकि समाज में यह चेतना आ रही है कि आरक्षण का लाभ समान रूप से वितरित होना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर होने वाली तुच्छ राजनीति पर कड़ा प्रहार किया। भागवत ने कहा, "आरक्षण वास्तव में समाज को जोड़ने और सामाजिक एकता स्थापित करने का एक पवित्र उपाय था, लेकिन इसका राजनीतिकरण कर दिया गया, जिससे समाज में कड़वाहट पैदा हुई। यह उपाय अपने आप में कतई गलत नहीं है, लेकिन जो लोग राजनीतिक लाभ के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, वे जानबूझकर गलत दिशा में तलवार चला रहे हैं। जब तक इस राजनीतिक सोच में सुधार नहीं होगा, तब तक स्थितियां पूरी तरह से नहीं बदलेंगी।"

रोजगार, नेतृत्व और युवाओं के लिए आरएसएस प्रमुख का विजन

आरक्षण के अलावा संघ प्रमुख ने युवाओं के सामने मौजूद अन्य ज्वलंत मुद्दों जैसे बेरोजगारी, करियर और नेतृत्व की परिभाषा पर भी विस्तार से अपने विचार साझा किए। उन्होंने युवाओं से अपनी मानसिकता बदलने का आह्वान करते हुए कहा कि केवल सरकारी नौकरी या किसी निजी कंपनी में सर्विस करना ही एकमात्र रोजगार नहीं है। हमें उद्यमिता (Entrepreneurship), स्वरोजगार और कौशल विकास (Skill Development) को अपनाना होगा। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि आज समाज में शारीरिक श्रम करने वाले कामगारों को वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं। समाज को श्रम की गरिमा (Dignity of Labour) को पुनः स्थापित करना होगा। जो व्यक्ति ईमानदारी से काम कर रहा है, चाहे वह छोटा काम ही क्यों न हो, समाज को उसका सम्मान करना चाहिए।

सच्चे नेतृत्व की परिभाषा समझाते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि केवल बड़े-बड़े भाषण देना, चुनाव जीतना या उपदेश देना ही नेता होना नहीं है। एक सच्चा नेता वह होता है जो खुद पृष्ठभूमि में रहकर काम करता है, दूसरों को आगे बढ़ाता है और सफलता व सम्मान का श्रेय पूरी टीम के साथ साझा करता है। नेतृत्व का मुख्य उद्देश्य नए नेताओं को तैयार करना होना चाहिए जो भविष्य में समाज का मार्गदर्शन कर सकें। मुंबई में आयोजित इस भव्य युवा शिखर सम्मेलन में मोहन भागवत के इस बेबाक और स्पष्ट संवाद ने न केवल आरक्षण से जुड़े तमाम भ्रमों को दूर करने का काम किया, बल्कि देश की नई पीढ़ी को सामाजिक समरसता, डॉ. आंबेडकर के आदर्शों और राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक स्पष्ट रोडमैप भी प्रदान किया।