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जेल में बलूचों पर जुल्म: पाकिस्‍तान की कालकोठरी में अत्‍याचार के खिलाफ 9 दिनों से महाधरना

पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान से मानवाधिकारों के हनन और जेलों के भीतर हो रहे अमानवीय बर्ताव को लेकर बेहद विचलित करने वाली खबर सामने आ रही है। पाकिस्तानी जेलों की कालकोठरियों में बंद बलूच कैदियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर हो रहे भयंकर अत्याचार और उत्पीड़न के खिलाफ पीड़ितों के परिवारों और स्थानीय नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा है। इस दमनकारी नीति के विरोध में प्रदर्शनकारी पिछले 9 दिनों से लगातार खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे हुए हैं। कड़ाके की ठंड, भूख और प्यास की परवाह किए बिना न्याय की गुहार लगा रहे इन बलूचों की सुनने वाला कोई नहीं है। पाकिस्तानी सरकार और स्थानीय प्रशासन की इस अनदेखी ने बलूचिस्तान के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तनाव बढ़ा दिया है।

पाकिस्तानी हुकूमत की दमनकारी नीति और लापता लोगों का बढ़ता दर्द

बलूचिस्तान के क्वेटा, ग्वादर और कराची जैसे प्रमुख शहरों में इस आंदोलन की गूंज साफ सुनाई दे रही है। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों और बलूच एकजुटता समितियों का आरोप है कि जेलों में बंद बलूच युवाओं को बुनियादी मानवाधिकारों जैसे चिकित्सा, कानूनी सहायता और परिजनों से मिलने की अनुमति तक नहीं दी जा रही है। इसके अलावा, कई ऐसे बलूच नागरिक भी हैं जो महीनों से पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों की अवैध हिरासत में हैं और उनके ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। प्रदर्शन कर रही महिलाओं और बच्चों का कहना है कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक उनके अपनों को अदालतों के सामने पेश नहीं किया जाता और जेलों में टॉर्चर बंद नहीं होता।

कूटनीतिक गलियारों और वैश्विक स्तर पर उठने लगी बलूचों की आवाज

पाकिस्तानी मीडिया में इस महाधरने को पूरी तरह से सेंसर करने या दबाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से यह दर्दनाक कहानी अब पूरी दुनिया के सामने आ चुकी है। नई दिल्ली, वाशिंगटन, लंदन और जिनेवा में सक्रिय मानवाधिकार संगठनों ने इस मामले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान सरकार इस मुद्दे को दबाकर बलूचिस्तान में चल रहे स्वतंत्रता और अधिकारों के आंदोलन को कमजोर करना चाहती है। कूटनीतिक जानकारों के मुताबिक, जेलों में हो रहे इस क्रूर अत्याचार और नौ दिनों की लंबी अनदेखी के कारण पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के घेरे में आ गया है।

क्या बलूचिस्तान में स्थिति बेकाबू होने का इंतजार कर रहा है प्रशासन

धरने के नौवें दिन भी किसी सरकारी प्रतिनिधि या सैन्य अधिकारी द्वारा प्रदर्शनकारियों से बातचीत न करना यह साफ दर्शाता है कि पाकिस्तानी प्रशासन इस गंभीर संकट को लेकर कितना असंवेदनशील है। स्थानीय बलूच नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी जायज मांगें जल्द नहीं मानी गईं और जेलों में बंद कैदियों पर टॉर्चर नहीं रुका, तो यह शांत धरना एक उग्र आंदोलन में तब्दील हो सकता है। पूरे प्रांत में सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा कर दिया गया है और कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं पर भी पाबंदी लगा दी गई है, जिससे बलूचिस्तान के जमीनी हालात पल-पल में और अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।