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दिल्ली में 18वां BRICS समिट: US और यूरोप में क्या वाकई हुआ ‘ब्लैकआउट’? वेस्टर्न मीडिया की चुप्पी और पाकिस्तान में मची बेचैनी का पूरा सच

भारत की मेजबानी में राजधानी नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का भव्य आयोजन शुरू हो चुका है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान सहित दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष नेता दिल्ली की धरती पर जुटे हैं। जहां एक तरफ ग्लोबल साउथ और उभरते बाजारों के लिए यह ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोप और पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में इस आयोजन को लेकर एक अजीबोगरीब कूटनीतिक सन्नाटा और बेचैनी साफ महसूस की जा रही है। पश्चिमी मीडिया के प्रमुख टीवी चैनलों के प्राइम टाइम से दिल्ली समिट की विजिबिलिटी को सीमित रखना और पाकिस्तान के भीतर अपनी ही हैसियत पर उठ रहे सवालों ने इस बात की पोल खोल दी है कि इस महामंथन से दुनिया के शक्ति संतुलन में कितनी बड़ी हलचल मची है।

क्या अमेरिका और यूरोप में वाकई ब्रिक्स समिट का 'ब्लैकआउट' है?

पश्चिमी दुनिया में ब्रिक्स सम्मेलन की कवरेज को यदि ध्यान से देखा जाए, तो मुख्यधारा के बड़े अमेरिकी और यूरोपीय ब्रॉडकास्ट चैनलों (जैसे सीएनएन, बीबीसी, फॉक्स न्यूज) पर इस सम्मेलन को वह प्राइम टाइम और लाइव स्क्रीन स्पेस नहीं दिया जा रहा है, जो अमूमन जी-7 (G7) या नाटो (NATO) की बैठकों को मिलता है। हालांकि, इसे तकनीकी तौर पर पूरी तरह 'ब्लैकआउट' कहना भी सही नहीं होगा, क्योंकि ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, फाइनेंशियल टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे दिग्गज आर्थिक और रणनीतिक प्रकाशन इस बैठक पर पैनी नजर गड़ाए हुए हैं।

यह स्थिति वास्तव में 'ब्लैकआउट' नहीं, बल्कि एक सोची-समझी 'सिलेक्टिव कवरेज' और कम विजिबिलिटी की रणनीति है। पश्चिमी मीडिया यह दिखाने से बचना चाहता है कि दुनिया में अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी आधिपत्य के समानांतर कोई नया बहुपक्षीय वित्तीय व राजनीतिक ढांचा इतनी मजबूती से खड़ा हो रहा है, जिसमें विश्व की आधी से अधिक आबादी और ऊर्जा व्यापार की मुख्य धुरी शामिल है।

वेस्टर्न मीडिया का मुख्य फोकस: 'पुतिन-शी का मंच' बनाम 'भारत का कूटनीतिक संतुलन'

पश्चिमी विश्लेषकों और मीडिया आउटलेट्स की कवरेज में एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई दे रहा है। उनकी रिपोर्टिंग की मुख्य दिशा यह साबित करने पर टिकी है कि ब्रिक्स एक 'एंटी-वेस्ट' (पश्चिम विरोधी) ब्लॉक में तब्दील हो रहा है, जहां रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पश्चिमी प्रतिबंधों को बेअसर करने की कोशिश में जुटे हैं।

हालांकि, इसी कवरेज में अमेरिकी व यूरोपीय थिंक टैंक भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की खुलकर सराहना भी करने को मजबूर हैं। वेस्टर्न मीडिया ने बार-बार रेखांकित किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व यह सुनिश्चित कर रहा है कि ब्रिक्स किसी एक देश (विशेषकर चीन) की कठपुतली या अमेरिकी विरोधी प्रोपेगैंडा का अखाड़ा न बने, बल्कि यह विशुद्ध रूप से आर्थिक सुधारों और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था का निष्पक्ष मंच बना रहे।

डी-डॉलराइजेशन और डिजिटल करेंसी से पश्चिम की उड़ी नींद

पश्चिमी राजधानियों में ब्रिक्स को लेकर असली चिंता राजनीतिक बयानों से ज्यादा आर्थिक तंत्र में होने वाले बदलावों को लेकर है। दिल्ली समिट में स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने, सीमा पार भुगतान के लिए राष्ट्रीय डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने (Digital Payment Grid) और स्विफ्ट (SWIFT) के विकल्प तैयार करने के प्रस्तावों ने वाशिंगटन और यूरोपीय बैंकों के माथे पर पसीना ला दिया है।

यदि अंतरराष्ट्रीय तेल, गैस और व्यापारिक आपूर्ति में अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व कम होता है, तो पश्चिमी देशों की प्रतिबंध लगाने की ताकत और वित्तीय दबदबा हमेशा के लिए कमजोर हो जाएगा। इसी कारण पश्चिमी अखबारों के बिजनेस पन्नों पर दिल्ली की हर घोषणा की बाल की खाल निकाली जा रही है।

पाकिस्तान में क्यों मचा है 'पैनिक'? वेटिंग लिस्ट और अलगाव का दर्द

इधर पश्चिमी मीडिया जहां रणनीतिक चुप्पी साधे हुए है, वहीं पाकिस्तान के मीडिया और राजनीतिक हलकों में दिल्ली समिट को लेकर खुला द्वंद्व और भारी बेचैनी देखने को मिल रही है। पाकिस्तानी मीडिया (डॉन, एक्सप्रेस ट्रिब्यून आदि) और सोशल मीडिया पर टीवी डिबेट्स में अपनी ही सरकार की विदेश नीति पर कड़े सवाल दागे जा रहे हैं:

  • वेटिंग लिस्ट में क्यों खड़ा है पाकिस्तान: पाकिस्तानी विश्लेषक इस बात पर माथापच्ची कर रहे हैं कि जब मिस्र, इथियोपिया, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश ब्रिक्स के मुख्य पटल पर पहुंच चुके हैं, तो चीन और रूस से नजदीकी का दावा करने वाला पाकिस्तान ब्रिक्स के मुख्य दरवाजे पर ही क्यों अटका रह गया।

  • भारत का कड़ा वीटो और कूटनीतिक कद: पाकिस्तानी टीवी एक्सपर्ट्स (जैसे कमर चीमा, शकील चौधरी आदि) खुले तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि भारत के सख्त रुख और अंतरराष्ट्रीय साख के चलते जब तक पाकिस्तान आतंकवाद और सीमा पार नीति पर अपने गिरेबान में नहीं झांकेगा, तब तक ब्रिक्स में उसकी एंट्री नामुमकिन है।

  • इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक तुलना: पाकिस्तानी पत्रकार यह तुलना कर अपनी ही व्यवस्था का मजाक उड़ा रहे हैं कि भारत दिल्ली में 20 से अधिक वैश्विक नेताओं की सुरक्षा, आधुनिक होटल्स और तकनीकी बुनियादी ढांचा चुटकियों में उपलब्ध करा रहा है, जबकि पाकिस्तान के पास ऐसे बड़े आयोजनों के लिए प्राथमिक संसाधनों का भी टोटा है।

यूएन महासचिव की मौजूदगी और रिफॉर्म की गूंज

दिल्ली सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की व्यक्तिगत मौजूदगी ने भी पश्चिमी और पाकिस्तानी नैरेटिव को बड़ा झटका दिया है। गुटेरेस ने साफ तौर पर स्वीकार किया है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और ब्रेटन वुड्स संस्थानों में पुराने नियम अब काम नहीं करेंगे और भारत जैसे देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में स्थाई जगह मिलनी चाहिए। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि ब्रिक्स अब कोई हाशिए पर पड़ा संगठन नहीं है, बल्कि दुनिया की मौजूदा व्यवस्था को रि-डिजाइन करने का सबसे ताकतवर केंद्र बन चुका है।

दुनिया देख रही है नए भारत का वैश्विक नेतृत्व

संक्षेप में कहें तो पश्चिमी मीडिया की 'कम विजिबिलिटी' उसकी भू-राजनीतिक लाचारी और डर को दर्शाती है, जबकि पाकिस्तानी मीडिया की चीख-पुकार उसके क्षेत्रीय अलगाव का नतीजा है। दिल्ली में चल रहा यह 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन यह सिद्ध कर रहा है कि आज भारत केवल एक भागीदार नहीं, बल्कि पूरब और पश्चिम के बीच सेतु की तरह खड़ा होकर वैश्विक एजेंडा तय करने वाला विश्वमित्र बन चुका है। दुनिया अब पश्चिमी मीडिया के फिल्टर से नहीं, बल्कि दिल्ली के भारत मंडपम से तय होने वाली नई दिशा से अपनी अगली आर्थिक रफ्तार तय करने जा रही है।