
News India Live, Digital Desk : बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद जिस ‘नए सवेरे’ की उम्मीद की गई थी, वह अब धुंधली पड़ती दिख रही है। जिस ‘जेन-जी’ (Gen Z) यानी युवा पीढ़ी ने सड़कों पर उतरकर सत्ता की चूलें हिला दी थीं, वही आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। ‘जुलाई क्रांति’ के छह महीने बाद भी देश स्थिरता और लोकतंत्र के लिए तरस रहा है। महंगाई, बेरोजगारी और कट्टरपंथ के बढ़ते साये ने बांग्लादेश को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ से रास्ता सिर्फ धुंध और अनिश्चितता की ओर जाता दिख रहा है।छात्रों का सपना बनाम कड़वी हकीकत: क्यों टूट रहा है भरोसा?तख्तापलट के समय छात्रों का नारा था—’वैषम्य विरोधी छात्र आंदोलन’ (भेदभाव के खिलाफ आंदोलन)। युवाओं को उम्मीद थी कि हसीना के जाने के बाद भ्रष्टाचार खत्म होगा और मेरिट के आधार पर नौकरियां मिलेंगी। लेकिन हकीकत इसके उलट है। ढाका की गलियों में अब चर्चा है कि केवल चेहरे बदले हैं, व्यवस्था नहीं। प्रशासन में अभी भी वही सुस्ती है और आम आदमी की जेब पर महंगाई का बोझ दोगुना हो चुका है।बांग्लादेश की ‘अकिलीज़ हील’: कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों का डरहसीना के जाने के बाद जो सबसे बड़ा शून्य पैदा हुआ, उसे कट्टरपंथी ताकतों ने भरने की कोशिश की है। हिफाजत-ए-इस्लाम और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों की बढ़ती सक्रियता ने उदारवादी युवाओं और अल्पसंख्यकों के मन में डर पैदा कर दिया है। ‘जुलाई क्रांति’ का नेतृत्व करने वाले कई छात्र नेता अब इस बात से परेशान हैं कि उनकी लोकतांत्रिक क्रांति को धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा हाइजैक किया जा रहा है।मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के सामने कांटों भरा ताजनोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को ‘उम्मीद की किरण’ माना गया था, लेकिन उनकी राह आसान नहीं है। उन पर दबाव है कि:चुनाव की तारीख: राजनीतिक दल जल्द चुनाव की मांग कर रहे हैं।अर्थव्यवस्था: विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट और गारमेंट सेक्टर (जीडीपी की रीढ़) में हड़ताल ने कमर तोड़ दी है।सुरक्षा: पुलिस बल का मनोबल गिरा हुआ है, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति नाजुक बनी हुई है।जेन-जी की हताशा: ‘क्या इसीलिए हमने जान दी थी?’सोशल मीडिया पर बांग्लादेशी युवाओं का गुस्सा फूट रहा है। कई छात्र प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्होंने देश को ‘तानाशाही’ से मुक्त कराया था, न कि ‘अराजकता’ में झोंकने के लिए। ढाका विश्वविद्यालय के एक छात्र ने अमर उजाला से बातचीत (सांकेतिक) के लहजे में कहा, “हम सड़कों पर गोलियां खाकर जीते, लेकिन अब देश कहाँ जा रहा है, यह कोई नहीं जानता।”
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