
बिहार में पूर्ण शराबबंदी को खत्म करने और इसके स्थान पर रेगुलेटेड सेल शुरू करने की रिपोर्ट्स सामने आने के बाद से राज्य की राजनीति का पारा सातवें आसमान पर है। एक तरफ जहां आर्थिक थिंक टैंक और विशेषज्ञ लगातार यह तर्क दे रहे हैं कि शराबबंदी से राजस्व का भारी नुकसान और अवैध तस्करी बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर कोई भी बड़ा फैसला लेने से बचती नजर आ रही है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोर-शोर से चल रही है कि आखिर सरकार और खासकर बीजेपी इस कड़े फैसले के आगे हाथ क्यों खींच रही है और इसके पीछे कौन सी बड़ी सामाजिक व राजनीतिक मजबूरियां जुड़ी हुई हैं।
महिलाओं का मजबूत वोट बैंक और सामाजिक सुरक्षा का डर
शराबबंदी के फैसले के पीछे सबसे बड़ा राजनीतिक कारण राज्य की आधी आबादी यानी महिला मतदाता (Women Voters) हैं। साल 2016 में जब पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी, तब इसे महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके खिलाफ होने वाले घरेलू हिंसा के मामलों को रोकने के एक बड़े मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा गया था। बीजेपी और एनडीए गठबंधन अच्छी तरह जानता है कि यदि इस कानून को हटाया जाता है, तो महिलाओं का गुस्सा सीधे तौर पर सरकार के खिलाफ फूट सकता है, जो आगामी चुनावों में किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ा नुकसान साबित हो सकता है। यही कारण है कि कोई भी पार्टी महिलाओं के इस मजबूत और एकजुट वोट बैंक को नाराज करने का जोखिम उठाने से कतरा रही है।
प्रशासनिक चुनौतियां और विपक्ष के हमलों का सियासी खतरा
शराबबंदी हटाने के रास्ते में केवल सामाजिक कारण ही नहीं, बल्कि भारी-भरकम प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियां भी आड़े आ रही हैं। यदि सरकार शराबबंदी वापस लेती है, तो मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और अन्य दल इसे सरकार की विफलता और नैतिकता के पतन के रूप में भुनाने में देर नहीं लगाएंगे। इसके अलावा, अवैध शराब के काले कारोबार से जुड़े माफिया तंत्र और पुलिस-प्रशासनिक गठजोड़ पर नकेल कसने की लंबी प्रक्रिया भी एक बड़ा सवाल है। इन तमाम 10 प्रमुख वजहों के चलते बीजेपी और एनडीए नेतृत्व फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है और इस संवेदनशील नीतिगत फैसले पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
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