
अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में इन दिनों रूस और भारत के बीच एक संभावित ऐतिहासिक रक्षा समझौते को लेकर हलचल तेज है। भारत और रूस के बीच जिस एडवांस्ड अर्ली-वार्निंग रडार सिस्टम 'वोरोनेझ-एम' (Voronezh-M) को लेकर चर्चाएं अंतिम चरण में हैं, उसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। रक्षा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यह तकनीक भारत के एयर डिफेंस आर्किटेक्चर में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। इस अत्याधुनिक रडार प्रणाली की गिनती दुनिया के सबसे ताकतवर और अचूक अर्ली-वार्निंग सर्विलांस सिस्टम्स में की जाती है, जो मीट्रिक तरंग दैर्ध्य (VHF) पर काम करता है और हजारों किलोमीटर दूर से ही दुश्मन की हर चाल पर पैनी नजर रखने में पूरी तरह सक्षम है।
रूसी रक्षा उद्योग के प्रमुख संस्थान अल्माज़-एंते (Almaz-Antey) द्वारा विकसित यह रडार सिस्टम पारंपरिक और आधुनिक दोनों तरह के हवाई खतरों का पलक झपकते ही पता लगाने के लिए जाना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह जमीन की वक्रता (Horizon) से परे जाकर भी लंबी दूरी के लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है। जब बात सुरक्षा और रणनीतिक बढ़त की आती है, तो भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को लगातार मजबूत करने के पथ पर अग्रसर है। इसी कड़ी में इस विशाल दीवारनुमा रडार सिस्टम को देश के सामरिक हितों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, जो आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरी तरह पूरा करता है।
रूसी सैन्य तकनीकी में वोरोनेझ-एम को ऐसा अचूक हथियार या यूं कहें कि सर्विलांस का 'ब्रह्मास्त्र' माना जाता है, जो युद्ध के मैदान में पासा पलटने की कुव्वत रखता है। पौराणिक कथाओं में ब्रह्मास्त्र को जिस प्रकार अचूक और अंतिम अस्त्र माना गया है, उसी तरह आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और हवाई सुरक्षा में इस रडार को दुश्मन के हर छुपने वाले पैंतरे को नेस्तनाबूद करने वाला कवच माना जा रहा है। इस रडार की रेंज इतनी व्यापक है कि यह अपनी क्षैतिज सीमा में 6,000 किलोमीटर और ऊर्ध्वाधर (vertical) सीमा में 8,000 किलोमीटर से अधिक के दायरे में अंतरिक्ष और आकाश दोनों में नजर रख सकता है।
इस रडार की सबसे डरावनी खूबी (दुश्मनों के लिए) यह है कि यह अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों, अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM), हाइपरसोनिक हथियारों और स्टेल्थ विमानों तक को बेहद शुरुआती चरण में ही डिटेक्ट कर लेता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह रडार मीलों दूर आसमान में फुटबॉल के आकार जितनी छोटी वस्तु को भी ट्रैक करने की अद्भुत क्षमता रखता है। फेस्ड एरे (Phased Array) तकनीक पर आधारित होने के कारण यह एक साथ सैकड़ों लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और बहुत तेजी से बीम को दिशा दे सकता है। यही कारण है कि रूसी सैन्य बेड़े में इसे रक्षात्मक और आक्रामक दोनों मोर्चों पर एक क्रांतिकारी और अचूक हथियार माना जाता है।
भौगोलिक और सामरिक दृष्टिकोण से भारत के लिए यह रक्षा सौदा काफी दूरगामी परिणाम देने वाला है। प्रस्तावित योजनाओं के तहत इस रडार सिस्टम को कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में स्थापित किए जाने की संभावना है, जो देश के दक्षिणी और मध्य हिस्से से व्यापक रणनीतिक कवरेज प्रदान करेगा। भारत के पड़ोसी देशों द्वारा लगातार अपनी मिसाइल क्षमताओं और वायु सेना को आधुनिक बनाने की होड़ के बीच, वोरोनेझ-एम रडार भारत को 'फर्स्ट-लुक' और 'अर्ली-वार्निंग' का बेजोड़ फायदा देगा। दुश्मन के खेमे से यदि कोई भी मिसाइल या स्टीवल्थ फाइटर जेट उड़ान भरता है, तो उसकी भनक भारत को उसके लॉन्चिंग पैड के आसपास ही लग जाएगी, जिससे एयर डिफेंस सिस्टम को एक्टिवेट करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा।
इस डील का एक और सबसे सकारात्मक पहलू 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत अभियान से जुड़ा हुआ है। इस समझौते के तहत इस विशालकाय रडार का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा भारत में ही स्थानीय स्तर पर निर्मित किए जाने का प्रावधान है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के तहत आने वाली इलेक्ट्रॉनिक एंड रडार डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (LRDE) इस पूरी परियोजना की देखरेख करेगी, जिसमें भारत की दर्जनों निजी कंपनियां और रक्षा स्टार्टअप्स भी साझीदार बनेंगे। इससे न सिर्फ देश के भीतर रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि हजारों तकनीकी नौकरियां भी सृजित होंगी, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा बूस्ट साबित होगा।
आज के दौर में जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक सर्च इंजन तकनीक रक्षा विश्लेषण और रणनीतिक खबरों को प्रोसेस कर रहे हैं, तब इस प्रकार की रक्षा संधियाँ वैश्विक सुरक्षा के पैटर्न को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं। पारंपरिक हथियारों की खरीद से आगे बढ़कर भारत अब ऐसी तकनीकों पर फोकस कर रहा है जो डेटा-संचालित, अत्यधिक ऊर्जा-कुशल और मॉड्यूलर हों। वोरोनेझ-एम रडार अपनी मॉड्यूलर प्रकृति के कारण पारंपरिक रडार प्रणालियों की तुलना में बहुत कम समय और कम कर्मियों के साथ स्थापित किया जा सकता है। यह तकनीक भविष्य के एआई-सक्षम युद्ध के मैदानों के लिए पूरी तरह अनुकूल है, जहाँ सूचना की गति ही जीत और हार तय करती है।
अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक दबावों और अमरीकी प्रतिबंधों (जैसे CAATSA) की तलवार लटकने के बावजूद भारत का रूस के साथ इस दिशा में आगे बढ़ना यह साबित करता है कि नई दिल्ली अपनी सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) से कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। भारत एक ओर जहाँ पश्चिमी देशों के साथ अत्याधुनिक सर्विलांस और ड्रोन तकनीक साझा कर रहा है, वहीं रूस के साथ इस प्रकार के भारी-भरकम और अकाट्य रडार सौदों को अंतिम रूप देकर अपनी सुरक्षा को लोहे का चने जैसा मजबूत बना रहा है। कुल मिलाकर, वोरोनेझ-एम रडार का भारत आना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक बहुत बड़ा बदलाव लाएगा, जिससे देश की सुरक्षा दीवार को अभेद्य सुरक्षा चक्र मिल सकेगा।
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