
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी का एक ताजा लेख इस समय देश की सियासत का सबसे गर्म मुद्दा बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय हालातों, विशेष रूप से गाजा, फिलिस्तीन और ईरान के मानवीय संकट पर लिखे गए उनके इस लेख ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस और तीखे बयानों के दौर को जन्म दे दिया है। सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कई सामाजिक संगठनों ने इस लेख को लेकर सोनिया गांधी और पूरी कांग्रेस पार्टी को आड़े हाथों लिया है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि कांग्रेस अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर तो खुलकर बोलती है, लेकिन जब पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं, तो वह 'सेलेक्टिव आउटरेज' (चुनिंदा आक्रोश) की नीति अपनाते हुए पूरी तरह मौन हो जाती है।
गाजा और ईरान के संकट पर सोनिया गांधी ने लेख में क्या लिखा
अपने लेख में सोनिया गांधी ने मध्य पूर्व (Middle East) में चल रहे युद्ध और इसके कारण आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने गाजा में हो रहे मानवाधिकारों के हनन और ईरान के मौजूदा राजनीतिक हालातों का जिक्र करते हुए वैश्विक समुदाय से शांति बहाली की अपील की। कांग्रेस नेता ने लिखा कि युद्ध कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता और निर्दोष लोगों की जान बचाना हर लोकतांत्रिक देश की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके इस लेख को कांग्रेस के अंतरराष्ट्रीय रुख और मानवाधिकारों के प्रति उनकी संवेदनशीलता के तौर पर पेश किया गया, लेकिन घरेलू राजनीति में इसका बिल्कुल उल्टा असर देखने को मिला।
बीजेपी का 'सेलेक्टिव आउटरेज' का आरोप, पूछा सबसे बड़ा सवाल
लेख के सामने आते ही बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने सोनिया गांधी पर चौतरफा हमला बोल दिया। बीजेपी नेताओं का कहना है कि सोनिया गांधी को गाजा और ईरान के नागरिकों का दर्द तो बखूबी दिखाई देता है, लेकिन भारत की सीमा से सटे बांग्लादेश में महीनों से प्रताड़ित हो रहे हिंदू भाई-बहनों की चीखें उन्हें सुनाई नहीं देतीं। सोशल मीडिया पर भी यह बहस तेज हो गई है कि जब बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों को निशाना बनाया जा रहा था, तब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस स्तर पर कोई बड़ा लेख या कड़ा रुख क्यों नहीं अपनाया। इस दोहरे मापदंड को लेकर कांग्रेस अब पूरी तरह से बैकफुट पर नजर आ रही है।
विदेशी कूटनीति बनाम घरेलू राजनीति का नया अखाड़ा बनी कांग्रेस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गांधी का यह लेख देश के भीतर एक खास वोट बैंक को साधने और वैश्विक स्तर पर अपनी एक लिबरल छवि बनाने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, मौजूदा दौर की राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी राजनीति के बीच यह दांव कांग्रेस के लिए उल्टा पड़ता दिख रहा है। पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे बांग्लादेश सीमा से सटे राज्यों के स्थानीय नेताओं ने भी इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि जो पार्टी अपने पड़ोसी मुल्क में सनातनियों पर हो रहे अत्याचारों पर खुलकर स्टैंड नहीं ले सकती, उसका सुदूर मध्य पूर्व के देशों के लिए विलाप करना केवल और केवल एक राजनीतिक ढोंग के अलावा कुछ नहीं है।
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