
News India Live, Digital Desk : हम अक्सर देखते हैं कि पर्दे पर जब दो अभिनेता शानदार कॉमेडी कर रहे होते हैं, तो हमें लगता है कि उनके बीच असल ज़िंदगी में भी जबरदस्त दोस्ती होगी। ‘हलचल’ फिल्म तो आपको याद ही होगी? वो अक्षय खन्ना और अर्शद वारसी की जुगलबंदी, वो मजेदार डायलॉग्स और लकी की वो एक्टिंग जिसे देखकर आज भी हम खिलखिला उठते हैं। लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि इस फिल्म को शूट करना अर्शद वारसी के लिए एक बहुत ही खराब अनुभव था?जी हाँ, सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है क्योंकि ‘हलचल’ एक ‘कल्ट क्लासिक’ बन चुकी है, लेकिन अर्शद वारसी ने हाल ही में खुलासा किया है कि उन्हें इस फिल्म के सेट पर काम करने में ज़रा भी मज़ा नहीं आया।सेट पर था ‘पिन-ड्रॉप’ साइलेंसअर्शद वारसी अपनी खुशमिजाजी के लिए जाने जाते हैं। उन्हें सेट पर हँसी-मजाक और लोगों से घुलना-मिलना पसंद है। लेकिन ‘हलचल’ के सेट पर माहौल बिल्कुल इसके उलट था। अर्शद ने बताया कि वहां लोग सिर्फ़ अपना काम करते थे और फिर चुपचाप अपने कोने में चले जाते थे। कोई किसी से बातचीत नहीं करता था। अर्शद को लगा जैसे वह किसी क्रिएटिव माहौल में नहीं, बल्कि किसी मशीन की तरह बस ‘नौकरी’ कर रहे हों।अक्षय खन्ना के साथ तालमेल की कमी?अक्षय खन्ना बॉलीवुड के मंझे हुए कलाकार हैं, लेकिन वे काफी निजी स्वभाव के (Reserved) व्यक्ति माने जाते हैं। अर्शद ने इसी बात की ओर इशारा करते हुए कहा कि अक्षय बहुत प्रोफेशनल थे, लेकिन उनके बीच वो ‘ब्रोमेंस’ या बातचीत का माहौल कभी नहीं बन पाया जिसकी उम्मीद एक कॉमेडी फिल्म के सेट पर रहती है। जब साथी कलाकारों के बीच हंसी-ठिठोली न हो, तो अर्शद जैसे आर्टिस्ट के लिए परफॉरमेंस देना मुश्किल हो जाता है।निर्देशन का अंदाज़ भी पड़ा भारीप्रियदर्शन सर अपनी फिल्मों को बहुत तेज़ी से शूट करने के लिए जाने जाते हैं। अर्शद का कहना है कि काम बहुत ही मेकेनिकली चल रहा था। एक सीन शूट हुआ और तुरंत दूसरे की तैयारी—बात करने का या रिलैक्स होने का वक्त ही नहीं मिलता था। अर्शद वारसी के लिए किसी भी प्रोजेक्ट में काम करने का मतलब है—सुकून और टीम के साथ एक कनेक्शन। जब वह गायब था, तो उनके लिए यह शूटिंग का समय बोझ बन गया।फैंस के लिए तो सुपरहिट, पर यादें कड़वीभले ही ‘हलचल’ आज हमारी पसंदीदा फिल्मों में से एक है, पर अर्शद वारसी के दिल में इसकी यादें कुछ धुंधली हैं। उनका कहना है कि काम का नतीजा अच्छा निकला, यह खुशी की बात है, लेकिन एक अभिनेता के तौर पर वह सफर उन्हें खुश नहीं कर पाया।अक्सर ग्लैमर के पीछे का सच यही होता है। जो फिल्में हमें पर्दे पर सुकून देती हैं, हो सकता है कि उन्हें बनाते समय कलाकारों ने मानसिक तौर पर काफी अकेलापन झेला हो। अर्शद वारसी का यह कबूलनामा हमें यह सिखाता है कि किसी भी काम में ‘इंसानी जुड़ाव’ (Human connection) कितना ज़रूरी है।
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