
News India Live, Digital Desk : अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच व्हाइट हाउस ने अपनी रणनीति साफ कर दी है। प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट ने उन तमाम अटकलों को खारिज कर दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि अमेरिका ने सीजफायर (युद्धविराम) को आगे बढ़ाने की मांग की है। लेविट ने कड़े शब्दों में कहा कि सीजफायर विस्तार की खबरें महज ‘खराब रिपोर्टिंग’ का नतीजा हैं और फिलहाल अमेरिका का पूरा ध्यान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मांगों को मनवाने पर है। अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि ईरान ने ‘रेड लाइन्स’ पार कीं, तो परिणाम गंभीर होंगे।पाकिस्तान बना ‘एकमात्र’ मध्यस्थ, इस्लामाबाद में फिर सजेगी वार्ता की मेजव्हाइट हाउस ने दुनिया भर के अन्य देशों की पेशकश को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान को इस विवाद में ‘इकलौता मीडिएटर’ (मध्यस्थ) स्वीकार किया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी पुष्टि की है कि वार्ता का अगला दौर अगले दो दिनों के भीतर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। इससे पहले 10 अप्रैल को हुई बातचीत के बाद ट्रंप ने दो सप्ताह के सीजफायर का जिक्र किया था। अब कूटनीतिक हलकों में चर्चा है कि 22 अप्रैल को खत्म हो रहे इस युद्धविराम को कूटनीतिक समाधान के लिए थोड़ा और समय दिया जा सकता है, लेकिन अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर इसकी मांग से इनकार किया है।इन 3 विवादित मुद्दों पर फंसा है पेंच, क्या झुकने को तैयार है तेहरान?मध्यस्थता की कोशिशों में जुटे अधिकारियों के अनुसार, इस समय बातचीत तीन मुख्य बिंदुओं पर टिकी है। पहला- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, दूसरा- सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ की सुरक्षा और तीसरा- युद्ध के दौरान ईरान को हुए नुकसान का मुआवजा। अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वह अपनी शर्तों पर कोई समझौता नहीं करेगा। कैरोलीन लेविट ने दबे सुर में चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान के लिए यही बेहतर होगा कि वह राष्ट्रपति ट्रंप की मांगों को स्वीकार कर ले, क्योंकि बातचीत अब निर्णायक मोड़ पर है।क्या ट्रंप का ‘प्रेशर गेम’ काम कर रहा है?राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप अपनी ‘पीस थ्रू स्ट्रेंथ’ (शक्ति के जरिए शांति) की नीति पर चल रहे हैं। एक तरफ जहां वह बातचीत के लिए इस्लामाबाद जाने को तैयार हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी प्रेस सचिव का सीजफायर की मांग से इनकार करना यह दर्शाता है कि अमेरिका ईरान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखना चाहता है। पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि उसे ही दोनों महाशक्तियों के बीच एकमात्र भरोसेमंद कड़ी माना जा रहा है। अब 22 अप्रैल की समयसीमा से पहले क्या कोई बड़ा समझौता होगा, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।
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