
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के गलियारों से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक कूटनीति के दोहरे मानदंडों को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है। पाकिस्तान और चीन ने बड़ी चालाकी से बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और उसकी आत्मघाती विंग 'मजीद ब्रिगेड' को वैश्विक आतंकी संगठन घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन अमेरिका ने फ्रांस और ब्रिटेन के साथ मिलकर इस कोशिश को पूरी तरह से नाकाम कर दिया है। यह घटनाक्रम न केवल चीन-पाकिस्तान की कूटनीतिक हार है, बल्कि वैश्विक मंच पर बदलते समीकरणों की बानगी भी है।
चीन-पाक का 'मास्टरप्लान' कैसे हुआ फ्लॉप
पाकिस्तान ने पिछले साल सितंबर में चीन के साथ मिलकर सुरक्षा परिषद की '1267 अल-कायदा प्रतिबंध समिति' के तहत इन संगठनों को ब्लैकलिस्ट करने की मांग की थी। पाकिस्तान के प्रतिनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने अपनी दलीलों में यह दिखाने की कोशिश की कि ये संगठन अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि, अमेरिका ने अपनी कूटनीतिक शक्ति का इस्तेमाल करते हुए इस प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोक दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका ने खुद 2019 में बीएलए को अपनी 'फारेन टेररिस्ट आर्गेनाइजेशन' की सूची में डाला था, लेकिन इस बार उसने यूएनएससी में चीन-पाक के प्रस्ताव को वीटो करके एक बड़ा संदेश दिया है।
आतंकवाद पर दोहरे मापदंडों का खेल
आतंकवाद के खिलाफ जंग में चीन का रवैया हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। याद रहे कि यह वही चीन है जिसने अतीत में भारत और अमेरिका द्वारा पाकिस्तानी आतंकियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधित करने के कई प्रस्तावों पर 'होल्ड' लगाकर उन्हें ठंडे बस्ते में डाला था। अब जब सुरक्षा परिषद में टेबल पलटी है, तो चीन और पाकिस्तान का साझा प्रस्ताव खुद उनके गले की फांस बन गया। विशेषज्ञ इसे 'कूटनीतिक शह-मात' का खेल बता रहे हैं, जहां आतंकवाद विरोधी समिति का उपाध्यक्ष होने के बावजूद पाकिस्तान अपनी मंशा पूरी करने में विफल रहा।
भू-राजनीतिक हितों की भेंट चढ़ती आतंकवाद की परिभाषा
बीते समय में कराची एयरपोर्ट, ग्वादर पोर्ट और जाफर एक्सप्रेस ट्रेन पर हुए आतंकी हमलों में इन संगठनों का नाम सामने आया है। इसके बावजूद, अमेरिका और पश्चिमी देशों का इस प्रस्ताव को रोकना यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद की परिभाषा अक्सर महाशक्तियों के भू-राजनीतिक हितों के इर्द-गिर्द घूमती है। यह घटनाक्रम साफ करता है कि जब तक वैश्विक शक्तियां आतंकवाद को सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करती रहेंगी, तब तक इस वैश्विक अभिशाप के खिलाफ एक सुर में लड़ना एक दूर का सपना बना रहेगा। फिलहाल, इस कदम ने वैश्विक मंच पर पाकिस्तान और चीन की कूटनीतिक साख को तगड़ा झटका दिया है।
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