
गाजा और लेबनान के मोर्चों पर जारी भीषण युद्ध के बीच इजरायल के अंदरूनी हालात अचानक बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायली डिफेंस फोर्सेज (IDF) में महिला सैनिकों की भूमिका को लेकर देश के भीतर एक नया और अभूतपूर्व सामाजिक-धार्मिक विवाद खड़ा हो गया है। सरकार और सेना द्वारा बख्तरबंद कोर (Armored Corps) यानी युद्धक टैंकों में महिलाओं की लड़ाकू भूमिका में एंट्री कराने के फैसले पर इजरायल के शक्तिशाली और कट्टरपंथी यहूदी धर्मगुरु (Orthodox Rabbis) बुरी तरह भड़क गए हैं। इस आंतरिक गतिरोध और देश के भीतर बड़े पैमाने पर बगावत के खतरे को देखते हुए प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार और सेना को फिलहाल बैकफुट पर आना पड़ा है।
जानिए टैंकों में महिला सैनिकों की एंट्री पर क्यों मचा है असली बवाल
इजरायल दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल है जहां पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं के लिए भी सैन्य सेवा पूरी तरह से अनिवार्य है। हाल के सालों में आईडीएफ ने महिलाओं को फ्रंटलाइन पर भेजने और उन्हें टैंक कमांडरों के रूप में प्रशिक्षित करने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था। सेना का तर्क था कि युद्ध के इस दौर में जनशक्ति की कमी को पूरा करने के लिए महिला सैनिक टैंकों को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं। लेकिन इजरायल के ऑर्थोडॉक्स यहूदी समुदाय और उनके धर्मगुरुओं ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि टैंकों के बेहद संकीर्ण और सीमित स्थान में पुरुष और महिला सैनिकों का एक साथ हफ्तों तक रहना धार्मिक नियमों और यहूदी मर्यादा (Modesty Laws) के पूरी तरह खिलाफ है।
कट्टरपंथी धर्मगुरुओं की खुली धमकी और नेतन्याहू की सेना का सरेंडर
इस विवाद ने उस समय तूल पकड़ लिया जब इजरायल के शीर्ष रब्बियों ने एक संयुक्त बयान जारी कर चेतावनी दी कि अगर महिलाओं को टैंकों में तैनात किया गया, तो वे अपने समुदाय के युवाओं को सेना में भर्ती होने से रोक देंगे। इजरायल में ऑर्थोडॉक्स युवाओं की एक बहुत बड़ी आबादी सेना में सेवा देती है, और युद्ध के इस नाजुक मोड़ पर उनकी बगावत इजरायल को भारी पड़ सकती थी। इस दबाव का असर यह हुआ कि इजरायली सेना के शीर्ष नेतृत्व को तुरंत एक उच्च स्तरीय बैठक बुलानी पड़ी। सेना ने कोर्ट और सरकार को सूचित किया है कि वे व्यावहारिक और सामाजिक चुनौतियों का हवाला देते हुए फिलहाल बख्तरबंद लड़ाकू इकाइयों में महिलाओं की स्थाई तैनाती के फैसले को टाल रहे हैं।
आंतरिक फूट से कमजोर हो सकता है दुश्मनों के खिलाफ इजरायल का मोर्चा
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह फैसला किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि वे एक तरफ खुद को आधुनिक और प्रगतिशील देश के रूप में पेश करना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हें अपनी सत्ता बचाने के लिए कट्टरपंथी राजनीतिक दलों के समर्थन की सख्त जरूरत है। इजरायल के मानवाधिकार संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने सेना के इस फैसले की तीखी आलोचना की है और इसे महिलाओं के अधिकारों का हनन बताया है। दुश्मनों से घिरे इजरायल के लिए युद्ध के इस दौर में यह अंदरूनी सामाजिक फूट और सेना का पीछे हटना आने वाले दिनों में देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर सकता है।
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