Tuesday , August 18 2026

गार्ड को नहीं मिली बैठने की कुर्सी तो रोक दी वैशाली एक्सप्रेस: गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर 38 मिनट तक हलकान रहे यात्री, रेलवे महकमे में मचा हड़कंप

भारतीय रेलवे के सबसे व्यस्त और प्रतिष्ठित रूटों में से एक पर चलने वाली वैशाली सुपरफास्ट एक्सप्रेस में पूर्वोत्तर रेलवे (NER) के मुख्यालय गोरखपुर जंक्शन पर एक बेहद अजीबोगरीब और चौंकाने वाला वाकया सामने आया है। बिहार के सहरसा से चलकर नई दिल्ली जाने वाली 12553 वैशाली एक्सप्रेस जब गोरखपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर पहुंची, तो वहां ड्यूटी पर तैनात ट्रेन गार्ड (ट्रेन मैनेजर) ने ट्रेन को आगे रवाना करने से साफ मना कर दिया। इसका कारण कोई तकनीकी खराबी, इंजन में खराबी या ट्रैक पर कोई रुकावट नहीं, बल्कि गार्ड के केबिन (एसएलआर/ब्रेक वैन) में बैठने के लिए 'कुर्सी' का न होना था। गार्ड की इस अप्रत्याशित जिद और विरोध के चलते यह वीआईपी सुपरफास्ट ट्रेन लगभग 38 मिनट तक गोरखपुर स्टेशन पर बेबस खड़ी रही, जिसके कारण सैकड़ों यात्रियों को भारी उमस और गर्मी के बीच परेशानी का सामना करना पड़ा और रेल प्रशासन में हड़कंप मच गया।

गोरखपुर जंक्शन पर कैसे शुरू हुआ हाई-वोल्टेज ड्रामा: जानिए घटना का पूरा क्रम

वैशाली एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय के अनुसार गोरखपुर जंक्शन पर आकर रुकी थी। यहां नियमानुसार रनिंग स्टाफ (लोको पायलट और गार्ड) का क्रू चेंज (ड्यूटी का बदलाव) होना था। गोरखपुर से ट्रेन को आगे कानपुर और नई दिल्ली तक ले जाने के लिए नए ट्रेन मैनेजर ने जैसे ही ट्रेन के सबसे पिछले डिब्बे यानी ब्रेक वैन में प्रवेश किया, तो उन्होंने पाया कि बोगी के भीतर बैठने के लिए निर्धारित रिवॉल्विंग चेयर (कुर्सी) मौजूद नहीं थी या वह बुरी तरह टूटी हुई थी।

लंबी दूरी के सफर में बिना कुर्सी के खड़े होकर यात्रा करने में असमर्थता जताते हुए गार्ड ने कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने स्टेशन मास्टर और कैरिज एंड वैगन (C&W) विभाग को तुरंत कुर्सी की व्यवस्था करने का संदेश भेजा। जब कुछ मिनटों तक कोई ठोस व्यवस्था नहीं हुई और स्टेशन मास्टर ने ट्रेन को आगे ले जाने के लिए प्रस्थान का ग्रीन सिग्नल दिया, तो गार्ड ने नियमों का हवाला देते हुए हरी झंडी दिखाने और वॉकी-टॉकी पर लोको पायलट को 'ऑल राइट' क्लीयरेंस देने से साफ इनकार कर दिया।

प्लेटफॉर्म पर मची अफरा-तफरी: जब तक कुर्सी नहीं लगी, गार्ड ने नहीं दिया सिग्नल

गार्ड द्वारा सिग्नल रोके जाने के बाद स्टेशन पर ऑपरेटिंग और कमर्शियल विभाग के अधिकारियों के बीच अफरा-तफरी मच गई। प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन में बैठे यात्री यह समझ नहीं पा रहे थे कि सिग्नल हरा होने के बावजूद सुपरफास्ट ट्रेन आगे क्यों नहीं बढ़ रही है। कई यात्री बोगियों से नीचे उतरकर पूछताछ केंद्र और गार्ड की बोगी के पास जमा हो गए।

मामला बढ़ता देख स्टेशन अधीक्षक और कैरिज विभाग के तकनीकी कर्मचारी दौड़ते हुए प्लेटफॉर्म पर पहुंचे। पहले तो गार्ड को समझा-बुझाकर ट्रेन आगे ले जाने का आग्रह किया गया, लेकिन गार्ड ने रेलवे के संरक्षा और सेवा नियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट कर दिया कि जब तक केबिन में बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं होगी, ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगी। आखिरकार, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए रेलवे वर्कशॉप/स्टोर से आनन-फानन में एक नई कुर्सी मंगवाई गई। तकनीकी कर्मचारियों ने ब्रेक वैन के अंदर ले जाकर उस कुर्सी को ठीक से फिट और फिक्स किया। इसके बाद गार्ड ने संतुष्ट होकर ब्रेक प्रेशर जांचा और हरी झंडी दिखाकर ट्रेन को रवाना किया। इस पूरी प्रक्रिया में बहुमूल्य 38 मिनट बर्बाद हो गए।

यात्रियों की फजीहत और पीछे आ रही ट्रेनों की गति पर पड़ा असर

वैशाली एक्सप्रेस देश की उन प्रमुख प्रीमियम ट्रेनों में से एक है, जिसमें सफर करने वाले अधिकांश यात्री समयबद्ध यात्रा, कनेक्टिंग फ्लाइट्स या जरूरी सरकारी-निजी कामकाज के लिए दिल्ली की यात्रा करते हैं। गोरखपुर स्टेशन पर बिना किसी स्पष्ट घोषणा के 38 मिनट तक ट्रेन के रुके रहने से यात्रियों में भारी रोष देखा गया। भीषण गर्मी और उमस में बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं परेशान होते रहे।

इसके अलावा, गोरखपुर-लखनऊ रेलखंड पर ट्रेनों की सघन आवाजाही होने के कारण वैशाली एक्सप्रेस के 38 मिनट तक प्लेटफॉर्म घेरे रहने से पीछे आ रही अन्य मेल-एक्सप्रेस और मालगाड़ियों के संचालन पर भी 'चेन रिएक्शन' जैसा असर पड़ा। कुछ ट्रेनों को आउटर सिग्नल्स पर नियंत्रित (डीटेन) करना पड़ा, जिससे रेल यातायात का टाइम-टेबल प्रभावित हुआ।

ट्रेन गार्ड (ट्रेन मैनेजर) का पक्ष: क्या कहता है रेलवे का रनिंग स्टाफ नियम?

इस घटना के बाद सोशल मीडिया और रेलवे हलकों में बहस छिड़ गई कि क्या गार्ड का यह कदम सही था या गैर-जिम्मेदाराना। ऑल इंडिया गार्ड्स काउंसिल और रनिंग स्टाफ यूनियनों के अनुसार, ट्रेन मैनेजर का काम केवल हरी झंडी हिलाना नहीं होता, बल्कि पूरी ट्रेन की सुरक्षा, प्रेशर गेज की मॉनिटरिंग, इमरजेंसी ब्रेक संचालन और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत एक्शन लेना होता है।

गार्ड को 8 से 10 घंटे तक लगातार हिचकोले खाते डिब्बे में सफर करना पड़ता है। रेलवे बोर्ड के सुरक्षा नियमों के तहत हर ब्रेक वैन में अनिवार्य रूप से शॉक-एब्जॉर्बिंग रिवॉल्विंग चेयर, पर्याप्त वेंटिलेशन, लाइट, फैन, फर्स्ट-एड बॉक्स और वर्किंग प्रेशर गेज होना अनिवार्य है। यदि बोगी में बुनियादी सुविधा ही नहीं होगी, तो शारीरिक थकान के चलते सुरक्षा में गंभीर चूक हो सकती है। कर्मचारियों का तर्क है कि ट्रेन जब मूल डिपो (सहरसा या बरौनी) से रवाना हुई थी, तभी प्राइमरी मेंटेनेंस के दौरान कैरिज विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि ब्रेक वैन में सभी अनिवार्य उपकरण और फर्नीचर दुरुस्त हैं या नहीं।

पूर्वोत्तर रेलवे (NER) प्रशासन की सख्त जांच: जवाबदेही होगी तय

इस अप्रत्याशित घटना को पूर्वोत्तर रेलवे प्रशासन और ऑपरेटिंग विभाग ने बेहद गंभीरता से लिया है। एक वीआईपी सुपरफास्ट ट्रेन का मुख्यालय स्टेशन पर इतने लंबे समय तक सिर्फ एक कुर्सी के अभाव में खड़ा रहना सीधे तौर पर मेंटेनेंस और समन्वय की बड़ी लापरवाही को उजागर करता है।

रेलवे के वरिष्ठ मंडल परिचालन प्रबंधक (DOM/Sr. DOM) ने इस पूरे मामले की विस्तृत विभागीय जांच के आदेश दे दिए हैं। जांच में मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर पड़ताल की जा रही है:

  • प्रारंभिक स्टेशन (Primary Maintenance Depot) से ट्रेन बिना अनिवार्य कुर्सी और जांच के कैसे रवाना कर दी गई?

  • क्या ट्रेन गार्ड स्टेशन प्रशासन से समन्वय बनाकर ट्रेन को आगे किसी अगले बड़े स्टेशन तक ले जा सकते थे, या यह सीधे तौर पर ड्यूटी में बाधा और यात्रियों को बंधक बनाने जैसा कदम था?

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, जांच रिपोर्ट आने के बाद संबंधित डिपो के मेंटेनेंस सुपरवाइजर, कैरिज स्टाफ और ट्रेन मैनेजर की जवाबदेही तय कर उचित विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।