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सत्ता के भय से मुक्त अपराधी करने लगे तांडव? बिहार में क्यों बेखौफ हो रहे अपराधी

भारत के राजनीतिक और सामाजिक मानचित्र पर अपनी अनूठी पहचान रखने वाले बिहार राज्य में इन दिनों कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ गई है। आम नागरिकों से लेकर विपक्ष के राजनेताओं और नीति निर्धारकों के मन में एक ही सवाल बार-बार कौंध रहा है कि आखिर क्या वजह है कि राज्य के भीतर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें अब पुलिस, कानून और प्रशासन का कोई खौफ ही नहीं बचा है। दिनदहाड़े गोलीबारी, फिरौती के लिए अपहरण, लूटपाट और हत्या जैसी जघन्य वारदातों ने राज्य के आम जनजीवन को झकझोर कर रख दिया है। एक समय जिस सुशासन की मिसाल देकर बिहार में प्रशासनिक कसावट की बात की जाती थी, आज वही व्यवस्था इन बढ़ते आपराधिक मामलों के आगे सवालों के घेरे में खड़ी नजर आती है। आखिर क्यों ऐसा प्रतीत होता है कि अपराधी सत्ता और कानून के भय से पूरी तरह मुक्त होकर खुलेआम तांडव कर रहे हैं? आइए एक इन्वेस्टिगेटिव और ग्राउंड रिपोर्टर की नजर से गहराई से जानते हैं कि बिहार में अपराधियों के बेखौफ होने के पीछे के वे कौन से सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक कारण हैं जो इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।

कानून का खौफ या प्रशासनिक ढिलाई? क्यों बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं बदमाश

किसी भी सभ्य समाज और राज्य की रीढ़ उसकी मजबूत कानून-व्यवस्था होती है, जहाँ अपराधियों के मन में खाकी वर्दी और कानून का ऐसा खौफ होना चाहिए कि वे कोई भी अपराध करने से पहले सौ बार सोचें। लेकिन पिछले कुछ समय से बिहार के विभिन्न जिलों—चाहे वह राजधानी पटना हो या मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, छपरा या पूर्णिया—से जिस तरह की आपराधिक वारदातें सामने आ रही हैं, वे यह बताने के लिए काफी हैं कि अपराधियों के दिलों से कानून का डर पूरी तरह से गायब हो चुका है। बदमाशों के भीतर यह दुस्साहस इस बात का प्रमाण है कि उन्हें कहीं न कहीं यह यकीन हो चला है कि वे अपराध करने के बाद आसानी से कानून की पैनी नजरों से बच निकलेंगे। पुलिस की कार्यप्रणाली में आती सुस्ती, अदालतों में मुकदमों की लंबी और जटिल प्रक्रिया तथा सजा मिलने में होने वाली भारी देरी इन अपराधियों के मनोबल को और अधिक मजबूत कर देती है। जब किसी समाज में कानून का डर कमजोर पड़ता है, तो अपराध एक समानांतर सत्ता की तरह उभरने लगता है, और यही स्थिति आज बिहार के कई हिस्सों में चिंता का विषय बनती जा रही है।

राजनीतिक संरक्षण और अपराधियों का गठजोड़: क्या सत्ता की आड़ में मजबूत हो रहे हैं बदमाश?

बिहार की राजनीति और अपराध का पुराना और गहरा नाता रहा है, जिसे समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों और विश्लेषकों द्वारा रेखांकित किया जाता रहा है। आज के समय में भी यह एक कड़वा सच है कि कई छोटे-बड़े अपराधी और बाहुबली प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक दलों, स्थानीय क्षत्रपों या सत्ता के गलियारों में बैठे प्रभावशाली लोगों के संरक्षण की आड़ में पलते हैं। जब चुनावों के दौरान या राजनीतिक जोड़-तोड़ में ऐसे तत्वों का इस्तेमाल होने लगता है, तो पुलिस और स्थानीय प्रशासन भी कार्रवाई करने से पहले कई बार राजनीतिक दबावों के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। यही वजह है कि जब कोई अपराधी किसी बड़े राजनीतिक चेहरे के आंचल के नीचे सुरक्षित महसूस करता है, तो उसका दुस्साहस सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। उसे यह विश्वास होता है कि यदि उस पर कोई कानूनी कार्रवाई हुई भी, तो उसका राजनीतिक गॉडफादर उसे बचा लेगा। जब तक राजनीति और अपराध के इस नापाक गठजोड़ को जड़ से उखाड़ कर फेंका नहीं जाता, तब तक आम जनता को भयमुक्त माहौल मिलना असंभव सा प्रतीत होता है।

पुलिसिया सुस्ती, तकनीकी कमियां और जमीनी स्तर पर खुफिया तंत्र की विफलता

कानून-व्यवस्था को बनाए रखने की मुख्य जिम्मेदारी राज्य की पुलिस और खुफिया तंत्र (Intelligence Network) पर होती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बिहार के कई थानों में आज भी आधुनिकीकरण और संसाधनों की भारी कमी बनी हुई है। थानों में पर्याप्त पुलिस बल का न होना, गश्त के लिए वाहनों की कमी और आधुनिक हथियारों व डिजिटल सर्विलांस तकनीक की सुस्त रफ्तार अपराधियों को हमेशा पुलिस से एक कदम आगे रखती है। इसके अलावा, बीट पुलिसिंग (Beat Policing) और जमीनी स्तर की खुफिया जानकारी जुटाने का तंत्र कई जगहों पर कमजोर पड़ चुका है। पुलिस का मुख्य ध्यान अक्सर वीवीआईपी सुरक्षा, धरना-प्रदर्शन और कागजी आंकड़ों को दुरुस्त करने पर रहता है, जिसके कारण जमीनी स्तर पर सक्रिय अपराधियों और छोटे सिंडिकेट्स पर समय रहते नकेल नहीं कस पाती है। जब तक पुलिस का इकबाल बुलंद नहीं होगा और अपराधियों के अंदर त्वरित कार्रवाई का खौफ पैदा नहीं होगा, तब तक इस तरह की वारदातों पर रोक लगाना कठिन होगा।

आम जनता के बीच बढ़ता खौफ और राज्य सरकार की कानून व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

इन तमाम आपराधिक घटनाओं और बेलगाम हो रहे बदमाशों के तांडव का सबसे बुरा असर राज्य के सामान्य नागरिकों, व्यापारियों और युवाओं पर पड़ रहा है। कारोबारियों में रंगदारी और फिरौती के फोन आने आम बात हो गई है, जिससे राज्य में नए निवेश और उद्योग-धंधों के विकास पर भी बुरा असर पड़ रहा है। आम आदमी अपने ही मोहल्लों और सड़कों पर खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा है। विपक्षी दल लगातार सरकार को इस मुद्दे पर घेर रहे हैं और जंगलराज की वापसी के आरोप लगा रहे हैं। जनता अब सिर्फ कागजी दावों और राजनीतिक बयानों से संतुष्ट होने वाली नहीं है, बल्कि वह धरातल पर ठोस कार्रवाई और पुलिस की सक्रियता देखना चाहती है। यदि समय रहते सरकार ने इस दिशा में कठोर और निर्णायक कदम नहीं उठाए, तो यह स्थिति आने वाले समय में राज्य की सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन सकती है।