News India Live, Digital Desk: मृत्यु एक ऐसा अटल सत्य है जिसे कोई टाल नहीं सकता, लेकिन जीवन के इस अंत के बाद क्या होता है? यह सवाल सदियों से मानव जिज्ञासा का केंद्र रहा है। हिंदू धर्म के गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद आत्मा के सफर का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण मिलता है। मान्यताओं के अनुसार, जब शरीर से प्राण निकलते हैं, तो आत्मा तुरंत परलोक नहीं जाती, बल्कि 13 दिनों तक अपने प्रियजनों के बीच ही रहती है। आइए जानते हैं गरुड़ पुराण के अनुसार इन 13 दिनों का रहस्य और पिंडदान की महत्ता।अंतिम संस्कार की साक्षी बनती है आत्मागरुड़ पुराण के मुताबिक, मृत्यु के तुरंत बाद यमदूत आत्मा को यमलोक ले जाते हैं, जहां उसे उसके जीवन के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा दिखाया जाता है। इसके कुछ घंटों बाद, आत्मा को फिर से उसके घर छोड़ दिया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि आत्मा अपने परिवार को देख सके और अपने ही अंतिम संस्कार की क्रियाओं का साक्षी बन सके। वह देखती है कि उसके जाने के बाद मोह के बंधन कैसे टूट रहे हैं।13 दिनों तक अपनों के बीच: मोह और विलाप का सफरशास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के बाद के 13 दिन आत्मा के लिए आत्मचिंतन का समय होता है। वह अपने घर-परिवार के इर्द-गिर्द ही भटकती है। वह अपने प्रियजनों को विलाप करते हुए देखती है और उनकी बातें सुनती है, लेकिन वह उनसे संपर्क नहीं कर पाती। इस दौरान आत्मा मोह के बंधन में होती है और बार-बार अपने शरीर में प्रवेश करने की कोशिश करती है, लेकिन यमदूतों के पहरे के कारण सफल नहीं हो पाती।परलोक की यात्रा का ‘पाथेय’ है पिंडदानपरलोक का रास्ता अत्यंत लंबा और कष्टकारी माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जिस तरह हम किसी लंबी यात्रा पर निकलते समय भोजन साथ रखते हैं, ठीक उसी तरह परिवार द्वारा किया गया पिंडदान आत्मा के लिए रास्ते के भोजन (पाथेय) का काम करता है। यही दान और तर्पण आत्मा को यमलोक की दुर्गम यात्रा तय करने के लिए आवश्यक शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है। बिना पिंडदान के आत्मा भूख-प्यास से व्याकुल होकर भटकती रहती है।तेरहवीं का संस्कार: सांसारिक बंधनों से अंतिम विदाईमृत्यु के 13वें दिन होने वाली पूजा और तेरहवीं का संस्कार सबसे महत्वपूर्ण है। इन 13 दिनों तक मोह में बंधी रहने वाली आत्मा को इस दिन के अनुष्ठान के बाद ही आगे बढ़ने की अनुमति मिलती है। तेरहवीं के संस्कार के साथ ही आत्मा इस संसार के सभी मोह-माया के बंधनों को पीछे छोड़कर पितृलोक या यमलोक की अपनी अंतिम यात्रा पर निकल पड़ती है।क्यों जरूरी है गरुड़ पुराण का पाठ?मृत्यु के बाद शोक संतप्त परिवार में गरुड़ पुराण का पाठ कराने की प्राचीन परंपरा है। इसके दो मुख्य कारण हैं:आत्मा के लिए: यह पाठ भटकती आत्मा को यह समझने में मदद करता है कि अब उसे मोह त्याग कर आगे बढ़ना है, जिससे उसे शांति और मोक्ष की राह मिलती है।परिजनों के लिए: गरुड़ पुराण का पाठ घर के सदस्यों को जीवन की नश्वरता का ज्ञान कराता है और इस कठिन दुःख को सहने की मानसिक व आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।
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