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Loan Default News: लोन की किस्त नहीं चुका पाए तो क्या बैंक तुरंत बेच देगा आपका घर? जानें क्या कहता है कानून और आपके अधिकार

नई दिल्ली। आज के दौर में घर, गाड़ी या बिजनेस के लिए बैंक से लोन लेना एक सामान्य बात है। लेकिन कई बार आर्थिक तंगी या किसी अनहोनी के कारण लोग समय पर अपनी ईएमआई (EMI) नहीं चुका पाते। ऐसे में सबसे बड़ा डर यह सताता है कि क्या बैंक रातों-रात घर से बाहर निकाल देगा या संपत्ति नीलाम कर देगा?अगर आप भी ऐसे ही किसी डर में हैं, तो राहत की बात यह है कि कानून सिर्फ बैंकों के लिए नहीं, बल्कि कर्जदारों की सुरक्षा के लिए भी बना है। पटियाला कोर्ट के वकील महमूद आलम के अनुसार, बैंक चाहकर भी आपकी संपत्ति को सीधे नहीं बेच सकता। आइए जानते हैं क्या हैं वो नियम जो आपकी प्रॉपर्टी को सुरक्षित रखते हैं।3 महीने तक किस्त न भरने पर क्या होता है?वकील महमूद आलम बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति लगातार 90 दिनों (3 महीने) तक अपने लोन की किस्त नहीं भरता, तो बैंक उस खाते को एनपीए (NPA – Non Performing Asset) घोषित कर देता है। इसका मतलब है कि बैंक की नजर में यह पैसा अब डूबने की कगार पर है।एनपीए घोषित होने के बाद बैंक तुरंत घर नीलाम नहीं करता, बल्कि आपको एक डिमांड नोटिस भेजता है। इसमें आपको बकाया चुकाने के लिए 60 दिन का समय दिया जाता है। अगर आप इस अवधि में भी भुगतान नहीं करते, तभी बैंक सरफेसी कानून (SARFAESI Act) के तहत कार्रवाई आगे बढ़ाता है।किन स्थितियों में बैंक नहीं बेच सकता आपकी संपत्ति?कानून में कुछ ऐसी शर्तें हैं जहाँ बैंक के हाथ बंधे होते हैं और वह आपकी प्रॉपर्टी नीलाम नहीं कर सकता:80% लोन चुकाने पर सुरक्षा: अगर आपने अपने कुल लोन का 80 प्रतिशत या उससे ज्यादा हिस्सा बैंक को चुका दिया है, तो बैंक सरफेसी कानून के तहत आपकी संपत्ति जब्त या नीलाम नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में बैंक को पैसा वसूलने के लिए सामान्य सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा, जो एक लंबी प्रक्रिया है।1 लाख से कम का बकाया: यदि आपकी बकाया राशि 1 लाख रुपये से कम है, तो भी बैंक इस कड़े कानून का इस्तेमाल नहीं कर सकता।कृषि भूमि (Agricultural Land): सरफेसी कानून खेती की जमीन पर लागू नहीं होता। किसानों के कर्ज के लिए नियम अलग और काफी लचीले हैं।क्या है सरफेसी कानून (SARFAESI Act 2002)?यह कानून साल 2002 में बैंकों को सशक्त बनाने के लिए लाया गया था। इसके तहत बैंकों को यह अधिकार मिलता है कि वे बिना कोर्ट के चक्कर काटे डिफॉल्टर की संपत्ति को कब्जे में ले सकें और उसे बेचकर अपना पैसा वसूल सकें। हालांकि, यह जितना बैंकों के पक्ष में दिखता है, इसमें कर्जदारों के लिए ‘राइट टू अपील’ (अपील का अधिकार) भी शामिल है। आप बैंक के नोटिस के खिलाफ डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) में अपनी बात रख सकते हैं।घबराएं नहीं, बैंक से करें बातअगर आप वाकई वित्तीय संकट में हैं, तो छिपने के बजाय बैंक के पास जाएं। बैंक अक्सर निम्नलिखित विकल्प देते हैं:लोन रिस्ट्रक्चरिंग: आपकी ईएमआई की राशि कम करके समय बढ़ाया जा सकता है।ग्रेस पीरियड: कुछ समय के लिए किस्तों पर रोक (Moratorium) लग सकती है।वन टाइम सेटलमेंट (OTS): एक निश्चित रकम देकर खाता बंद करने का विकल्प।