
भारत की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पूरी तरह से दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) की बारिश पर निर्भर करता है। लेकिन इस साल मानसून की उम्मीदों को एक बड़ा झटका लग सकता है। अर्थ सिस्टम साइंस ऑर्गनाइजेशन (ESSO) और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा जलवायु बुलेटिन ने एक ऐसी चिंताजनक रिपोर्ट जारी की है, जिसने नीति-निर्माताओं से लेकर देश के किसानों तक की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर (Equatorial Pacific Ocean) में इस समय अल नीनो (El Nino) की स्थिति न सिर्फ पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है, बल्कि आने वाले दिनों में इसके और अधिक मजबूत होने की डरावनी आशंका बनी हुई है। मौसम एजेंसियों ने साफ किया है कि समुद्र की सतह के साथ-साथ समुद्र के भीतर (सतह के नीचे) भी गर्म पानी की एक बड़ी बेल्ट बन चुकी है, जो मानसून की हवाओं को कमजोर कर सकती है।
आखिर क्या है अल नीनो और यह मौसम को कैसे बदलता है?
बहुत से लोग अल नीनो का नाम तो सुनते हैं, लेकिन यह समझ नहीं पाते कि हजारों किलोमीटर दूर समुद्र में होने वाली हलचल भारत के मौसम को कैसे बिगाड़ देती है।
सरल शब्दों में कहें तो अल नीनो एक वैश्विक जलवायु पैटर्न है। सामान्य दिनों में प्रशांत महासागर में चलने वाली तेज हवाएं गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया (पश्चिमी प्रशांत) की तरफ धकेलती हैं, जिससे हमारे इलाके में अच्छी बारिश होती है। लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो वह गर्म पानी वापस मुड़कर मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर (अमेरिका की तरफ) फैलने लगता है। इसी गर्म चरण को 'अल नीनो' कहा जाता है। यह हवा के पूरे सिस्टम और वायुमंडलीय दबाव को बदल देता है, जिसके कारण दुनिया के एक हिस्से में भारी बाढ़ आती है, तो भारत जैसे देशों में सूखा या कम बारिश की नौबत आ जाती है। यह पूरी प्रक्रिया 'इंसो' (ENSO) चक्र का हिस्सा है, जिसके ठंडे चरण को हम 'ला नीना' कहते हैं।
महासागरों में तेजी से बढ़ा तापमान: मई के हैरान करने वाले आंकड़े
आईएमडी के बुलेटिन में जो सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात सामने आई है, वह है महासागरों का लगातार गर्म होना।
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प्रशांत महासागर का हाल: मई के महीने में मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य के मुकाबले बहुत ज्यादा दर्ज किया गया है।
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भारत के समुद्री क्षेत्रों पर असर: चिंता सिर्फ प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं है। भारत के दोनों तरफ मौजूद समुद्री हिस्से— यानी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी भी सामान्य दिनों की तुलना में अधिक गर्म बने हुए हैं। अप्रैल के मुकाबले मई में तापमान का यह उछाल और ज्यादा व्यापक हो गया है, जो इस बात का पक्का सबूत है कि अल नीनो का सिस्टम लगातार मजबूत हो रहा है।
कैसा रहा है पिछले एक साल का चक्र (ENSO Timeline)
पिछले एक साल के दौरान समुद्र के भीतर तापमान में भारी उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। इसे आप नीचे दी गई समय-सारणी से आसानी से समझ सकते हैं:
| समय अवधि (Timeline) | समुद्र की स्थिति (ENSO Phase) | भारतीय मौसम पर संभावित असर |
| साल 2025 के मध्य में | न्यूट्रल (पूरी तरह सामान्य स्थिति) | मौसम संतुलित बना रहा। |
| अगस्त 2025 से फरवरी 2026 तक | ला नीना (La Nina – ठंडा चरण) | यह चरण आमतौर पर भारत में अच्छी बारिश और ठंड लाता है। |
| मार्च 2026 में | न्यूट्रल (सामान्य स्थिति) | समुद्र का तापमान थोड़े समय के लिए स्थिर हुआ। |
| जून 2026 (वर्तमान स्थिति) | अल नीनो (El Nino – गर्म चरण) | तापमान अल नीनो के थ्रेसहोल्ड को पार कर चुका है, जो खतरे की घंटी है। |
आगे का क्या है अनुमान और कितनी बड़ी है चुनौती?
मानसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम (MMCFS) का दावा
भारत के एडवांस फोरकास्ट सिस्टम (MMCFS) के कंप्यूटर मॉडल्स का अनुमान है कि जून से सितंबर के बीच, यानी पूरे मानसून के मुख्य चार महीनों के दौरान अल नीनो की यह स्थिति और अधिक गंभीर व आक्रामक हो सकती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जून से अगस्त के दौरान मध्य प्रशांत महासागर की यह गर्माहट लगातार बनी रहेगी और आने वाले हफ्तों में इसका दायरा और ज्यादा फैल सकता है। यह अल नीनो 'मध्यम से मजबूत' स्तर तक पहुंच सकता है।
चूंकि भारत में खरीफ फसलों (जैसे धान, मक्का, दालें) की बुआई और पूरी कृषि व्यवस्था मानसून की मानकीकृत बारिश पर टिकी होती है, ऐसे में अल नीनो का मजबूत होना फसलों के उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। इससे न सिर्फ ग्रामीण इलाकों में पानी का संकट गहरा सकता है, बल्कि आने वाले समय में महंगाई बढ़ने की चुनौती भी सरकार के सामने आ सकती है। मौसम विभाग आने वाले दिनों में इस पर और करीब से नजर बनाए रखने की सलाह दे रहा है।
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