
मालदीव की राजनीति में पिछले कुछ समय से 'इंडिया आउट' के नारों की गूंज सुनाई दे रही थी, लेकिन जब देश पर स्वास्थ्य संकट के बादल मंडराए, तो उसे एक बार फिर अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद पड़ोसी भारत की ही याद आई। मालदीव में दवाओं की भारी किल्लत और इमरजेंसी मेडिकल जरूरतों के बीच भारत ने बिना किसी देरी के दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया है। भारत सरकार ने एक विशेष विमान के जरिए दवाओं की एक बड़ी खेप मालदीव भेजी है, ताकि वहां के नागरिकों को समय पर इलाज मिल सके। यह कदम उन दावों को झुठलाता है जो दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट की बात कर रहे थे।
नाराजगी के बीच भारत ने निभाई पड़ोसी की जिम्मेदारी मालदीव की वर्तमान मुइज्जू सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही दोनों देशों के बीच राजनयिक तनाव की खबरें लगातार सुर्खियों में बनी हुई थीं। मालदीव की ओर से भारतीय सैनिकों की वापसी और कई द्विपक्षीय समझौतों पर कड़े रुख अपनाए गए थे। हालांकि, भारत ने हमेशा 'नेबरहुड फर्स्ट' यानी पड़ोसी पहले की नीति पर जोर दिया है। जब मालदीव ने दवाओं और सर्जिकल उपकरणों की कमी को लेकर मदद की गुहार लगाई, तो भारत ने पुरानी कड़वाहट को किनारे रखते हुए एक जिम्मेदार बड़े भाई की भूमिका निभाई और तुरंत मेडिकल सप्लाई को हरी झंडी दिखा दी।
इमरजेंसी मेडिकल सप्लाई में भेजी गईं जीवन रक्षक दवाएं भारत से भेजी गई इस खेप में मुख्य रूप से वह दवाएं शामिल हैं जिनका इस्तेमाल गंभीर बीमारियों के इलाज और अस्पतालों के रोजाना के कामकाज में किया जाता है। मालदीव में इन दवाओं का स्टॉक खत्म होने की कगार पर था, जिससे वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराने का डर पैदा हो गया था। भारतीय दूतावास और स्वास्थ्य मंत्रालय के समन्वय से भेजी गई इस मदद में एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक दवाएं और अन्य जरूरी इंजेक्शंस शामिल हैं। मालदीव के स्वास्थ्य अधिकारियों ने इस मदद के लिए भारत का आभार जताया है, जो इस बात का संकेत है कि मुश्किल वक्त में भूगोल और इतिहास ही काम आता है।
चीन के करीब जाने की कोशिशों के बीच भारत का बड़ा संदेश विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह त्वरित मदद न केवल एक मानवीय कार्य है, बल्कि एक मजबूत कूटनीतिक संदेश भी है। पिछले कुछ महीनों में मालदीव का झुकाव चीन की ओर बढ़ता देखा गया था, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा या स्वास्थ्य संकट के समय भारत ही सबसे पहले रिस्पोंडर (मददगार) के रूप में सामने आता है। चाहे 1988 का ऑपरेशन कैक्टस हो, सुनामी के दौरान मदद हो या फिर हालिया दवाओं की सप्लाई, भारत ने बार-बार साबित किया है कि रणनीतिक मतभेदों के बावजूद वह मालदीव के लोगों के साथ खड़ा है।
UK News