
भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की रणनीतिक चुप्पी और उनके बयानों के गहरे मायने निकाले जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों के बीच इस बात की चर्चा जोरों पर है कि जब देश की आंतरिक सुरक्षा, सामरिक मोर्चों और भू-राजनीतिक उथल-पुथल से जुड़े मुद्दों पर चारों तरफ तीखी बहस छिड़ी हुई है, तब देश के सबसे ताकतवर रणनीतिकारों में शुमार अमित शाह का इस तरह शांत रहना किसी बहुत बड़े तूफान के आने का संकेत तो नहीं है। देश के कई राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि आधुनिक कूटनीति के जनक आचार्य चाणक्य आज जीवित होते, तो वे भी मौजूदा सुरक्षा परिदृश्य और भारत की आक्रामक कूटनीति को देखकर हैरान रह जाते। पूर्वोत्तर के बेहद संवेदनशील भौगोलिक हिस्से 'चिकन नेक' (सिलिगुड़ी कॉरिडोर) की सुरक्षा हो या फिर देश की सेनाओं द्वारा अपनाई जा रही आक्रामक और निर्णायक 'प्रहार डॉक्ट्रिन' (Prahar Doctrine), हर मोर्चे पर भारत की रणनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। इन तमाम रणनीतिक बदलावों के बीच गृहमंत्री की यह चुप्पी इस बात की गवाही दे रही है कि पर्दे के पीछे कुछ बहुत बड़ा और अभूतपूर्व पक रहा है, जिसके परिणाम आने वाले समय में देश और दुनिया की राजनीति की दिशा तय करने वाले हैं।
'चिकन नेक' कॉरिडोर की सुरक्षा और पूर्वोत्तर का बदलता हुआ भू-राजनीतिक परिदृश्य
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले महज 22 किलोमीटर चौड़े 'चिकन नेक' यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सामरिक महत्ता किसी से छिपी नहीं है। भारत के विरोधी देशों की हमेशा से यह कुत्सित कोशिश रही है कि वे इस रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील गलवे को किसी तरह बाधित करके भारत के पूर्वोत्तर राज्यों का संपर्क मुख्य देश से काट दें। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने इस इलाके में जिस तरह की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था, बुनियादी ढांचे का विकास और सैन्य तैनाती बढ़ाई है, उसने दुश्मनों के हर नापाक मंसूबे पर पानी फेर दिया है। अमित शाह के नेतृत्व और मार्गदर्शन में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चों पर जिस प्रकार से खुफिया तंत्र को मजबूत किया गया है, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि भारत अब रक्षात्मक मुद्रा से पूरी तरह बाहर निकलकर आक्रामक और चौकस रुख अपना चुका है। इस क्षेत्र में चल रही सुगबुगाहट और सामरिक तैयारियों को देखकर विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि भारत विरोधी ताकतों के खिलाफ आने वाले दिनों में कोई बहुत बड़ा और कड़ा एक्शन देखने को मिल सकता है, जिसकी रूपरेखा पूरी तरह तैयार हो चुकी है।
'प्रहार डॉक्ट्रिन' और भारतीय सेनाओं की नई सामरिक सोच का बढ़ता दायरा
आज के आधुनिक दौर में युद्ध लड़ने के तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं। पारंपरिक लड़ाइयों का स्थान अब हाइब्रिड वॉरफेयर, साइबर हमलों और त्वरित आक्रामक कार्रवाइयों ने ले लिया है। भारतीय रक्षा बलों ने इसी आधुनिक जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'प्रहार डॉक्ट्रिन' जैसी आक्रामक रणनीतियों को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। इस डॉक्ट्रिन का मूल मंत्र साफ है कि यदि देश की सीमाओं या संप्रभुता पर किसी भी प्रकार की बुरी नजर डाली गई, तो दुश्मन को उसके घर में घुसकर करारा जवाब दिया जाएगा। गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के बीच तालमेल बिठाकर देश के भीतर और सीमाओं के पार जिस तरह से मास्टरस्ट्रोक खेले जा रहे हैं, उसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है। अमित शाह की कार्यशैली हमेशा से ही अचूक और परिणाम-उन्मुख रही है, और जब वे किसी बड़े मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से ज्यादा बयानबाजी नहीं करते हैं, तो इसका सीधा मतलब यह निकाला जाता है कि जमीन पर कोई बड़ा एक्शन पहले से ही प्लानिंग के तहत चल रहा होता है।
चाणक्य नीति और आधुनिक भारतीय राजनीति की सामरिक कूटनीति
प्राचीन काल से ही भारतीय उपमहाद्वीप में कूटनीति, गुप्तचर तंत्र और राज्य-संचालन के मामले में आचार्य चाणक्य के सिद्धांतों को सर्वोच्च माना जाता रहा है। चाणक्य नीति का मुख्य आधार यह कहता है कि अपने शत्रुओं को अपनी कमजोरियों का अंदाजा मत लगने दो और अपने अगले कदम को हमेशा गोपनीय रखो। मौजूदा समय में केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली में चाणक्य की इसी नीति की गहरी छाप देखने को मिलती है। जब देश के गृहमंत्री अमित शाह किसी भी संवेदनशील आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर पूरी तरह से गंभीर और नपे-तुले अंदाज में नजर आते हैं, तो विरोधी दलों के खेमे में स्वाभाविक तौर पर बेचैनी बढ़ जाती है। देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था, नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग, सीमा पार आतंकवाद पर नकेल और देश विरोधी ताकतों के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों की ताबड़तोड़ कार्रवाई इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत अब किसी भी कीमत पर अपनी सुरक्षा से समझौता करने के मूड में नहीं है।
आने वाले दिनों में देश की राजनीति और सुरक्षा में होने वाले बड़े बदलाव
राजनीतिक गलियारों में उठ रहे इन सवालों का जवाब आने वाला वक्त ही देगा, लेकिन इतना तय है कि भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा नीति अब एक बिल्कुल नए और मजबूत दौर से गुजर रही है। 'चिकन नेक' जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सुरक्षाबलों की पैनी नजर और 'प्रहार डॉक्ट्रिन' जैसी आक्रामक सैन्य सोच यह बताती है कि भारत ग्लोबल सुपरपॉवर बनने की राह में हर उस बाधा को पार करने के लिए तैयार है जो देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है। अमित शाह की यह सोची-समझी चुप्पी दरअसल किसी बड़े राजनीतिक या सामरिक धमाके से पहले की खामोशी है, जिस पर देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की पैनी नजर टिकी हुई है। जनता से लेकर राजनेताओं तक हर कोई यह जानने के लिए बेताब है कि इस खामोशी के बाद सरकार का अगला बड़ा और ऐतिहासिक कदम क्या होने वाला है।
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