
देश की राजनीति में इन दिनों 'एक देश, एक चुनाव' (One Nation, One Election) के मुद्दे पर सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। केंद्र सरकार द्वारा इस महत्वाकांक्षी और बहुचर्चित प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाने की कोशिशों के बीच विपक्षी दलों की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस विचार पर बेहद कड़ा प्रहार करते हुए इसे पूरी तरह से असंवैधानिक करार दिया है। चिदंबरम ने दो टूक शब्दों में यह तक कह दिया है कि उनका जमीर और अंतरात्मा इस तरह के प्रस्ताव के समर्थन की बिल्कुल भी इजाजत नहीं देती है। उनका मानना है कि यह कदम न केवल हमारे देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि इससे भारतीय लोकतंत्र की विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी गहरा आघात पहुंचेगा।
क्या है 'वन नेशन, वन इलेक्शन' प्रस्ताव और क्यों गरमाई है सियासत
'एक देश, एक चुनाव' का मुख्य उद्देश्य पूरे देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ, यानी एक ही समय पर कराना है। सरकार का तर्क है कि बार-बार चुनाव होने से देश का भारी-भरकम पैसा बर्बाद होता है, आचार संहिता लगने से विकास कार्य बाधित होते हैं और प्रशासनिक मशीनरी तथा सुरक्षा बलों पर लगातार दबाव बना रहता है। हालांकि, दूसरी तरफ विपक्षी दलों का यह साफ तौर पर कहना है कि यह विचार सैद्धांतिक रूप से भले ही आकर्षक लगे, लेकिन व्यावहारिक और संवैधानिक रूप से इसे लागू करना बेहद जटिल और खतरनाक साबित हो सकता है। पी चिदंबरम जैसे वरिष्ठ कानूनी जानकारों और राजनेताओं का यह मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से क्षेत्रीय मुद्दों और स्थानीय आकांक्षाओं का गला घोंट दिया जाएगा, जिससे राष्ट्रीय दलों को अनुचित राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ जाएगी और राज्यों की स्वायत्तता खतरे में पड़ जाएगी।
पी चिदंबरम ने उठाए गंभीर सवाल और दिए संवैधानिक तर्क
पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए संविधान के बुनियादी ढांचे पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने राज्यों को अपनी विधानसभाओं के कार्यकाल और स्थानीय शासन चलाने की जो स्वतंत्रता दी है, यह प्रस्ताव उस पर सीधा हमला है। यदि किसी राज्य में चुनी हुई सरकार अपना बहुमत खो देती है या कार्यकाल पूरा होने से पहले गिर जाती है, तो ऐसी स्थिति में क्या राष्ट्रपति शासन को पूरे 5 साल तक खींच कर रखा जाएगा? या फिर उस राज्य के लोगों को जबरन चुनाव से वंचित किया जाएगा? चिदंबरम का तर्क है कि भारत जैसे विशाल, बहु-सांस्कृतिक और विविधता से भरे देश में हर राज्य के अपने अलग राजनीतिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे होते हैं, जिन्हें राष्ट्रीय चुनावों की भीड़ में पूरी तरह से दबा दिया जाएगा।
क्षेत्रीय दलों और संघीय ढांचे पर पड़ने वाला दूरगामी प्रभाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' के लागू होने से सबसे बड़ा नुकसान देश के क्षेत्रीय दलों को उठाना पड़ सकता है। जब लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ एक ही मुद्दे और एक ही लहर पर लड़े जाते हैं, तो मतदाता अक्सर राष्ट्रीय चेहरों या राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, जिससे क्षेत्रीय अस्मिता, भाषा, संस्कृति और स्थानीय विकास से जुड़े मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। भारत के संघीय ढांचे की खूबसूरती यही है कि केंद्र और राज्य दोनों अपने-अपने दायरे में रहकर स्वतंत्र रूप से जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। इस व्यवस्था को बदलने से राज्यों की राजनीतिक ताकत कमजोर होगी, जो अंततः देश की लोकतांत्रिक मजबूती के लिए एक बड़ा संकट बन सकती है।
देश के राजनीतिक गलियारों में छिड़ी इस महाबहस का भविष्य
संसद से लेकर सड़कों तक और तमाम कानूनी मंचों पर 'एक देश, एक चुनाव' को लेकर बहस अपने चरम पर पहुंच चुकी है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि देश के आर्थिक संसाधनों को बचाने और शासन व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने के लिए यह क्रांतिकारी सुधार आवश्यक है, वहीं विपक्ष और देश के कई प्रतिष्ठित कानूनविद् इसे लोकतंत्र की मूल आत्मा के लिए एक बड़ी चुनौती मान रहे हैं। पी चिदंबरम के इस तीखे बयान ने इस गर्माती बहस में एक नया मोड़ ला दिया है आने वाले दिनों में यह मुद्दा देश की न्यायपालिका, संसद और चुनावी मैदान में सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बनने वाला है, जिस पर हर देशवासी की पैनी नजर टिकी हुई है।
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