
वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इस समय भूचाल आया हुआ है और एक बार फिर पाकिस्तान के दोहरे चरित्र ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। दशकों तक 'चीन को अपना सबसे पक्का यार' बताने वाला पाकिस्तान अब ड्रैगन की पीठ में छुरा घोंपकर अमेरिका के दरवाजे पर जा पहुंचा है। ताजा अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्टों और कूटनीतिक सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आई है कि पाकिस्तान की माली हालत इतनी ज्यादा खस्ता हो चुकी है कि उसे बचाने के लिए अब बीजिंग का कर्ज भी कम पड़ रहा है। इसी हताशा के चलते पाकिस्तानी हुक्मरानों और सैन्य नेतृत्व ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने गिड़गिड़ाते हुए सीधे तौर पर 10 अरब डॉलर के भारी-भरकम पैकेज या वित्तीय सहायता की मांग रख दी है। पाकिस्तान की इस यू-टर्न वाली नीति ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसका एकमात्र एजेंडा केवल और केवल विदेशी मदद और कर्ज के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को किसी तरह खींचना है, चाहे इसके लिए उसे अपने सबसे बड़े रणनीतिक साझीदार चीन को ही क्यों न धोखा देना पड़े।
ड्रैगन की पीठ पीछे अमेरिका से क्यों गलबहियां कर रहा है पाकिस्तान
पिछले कुछ वर्षों में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और अन्य परियोजनाओं के नाम पर पाकिस्तान ने चीन से अरबों डॉलर का कर्ज लिया था। इस कर्ज के बोझ तले पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस कदर दब चुकी है कि उसे हर साल केवल ब्याज चुकाने के लिए भी नए कर्जों की जरूरत पड़ती है। बीजिंग की तरफ से अब और अधिक खुला पैसा मिलने की उम्मीद लगभग खत्म होती देख पाकिस्तानी रणनीतिकारों ने एक बार फिर वाशिंगटन की ओर रुख किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापारिक और राजनीतिक नीतियों को साधने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि वह क्षेत्रीय सुरक्षा के नाम पर उसका सबसे वफादार प्यादा बन सकता है। लेकिन जानकारों का मानना है कि अमेरिका इस बात अच्छी तरह जानता है कि पाकिस्तान की नीयत क्या है और वह केवल अपने सामरिक स्वार्थों के लिए एक बार फिर वाशिंगटन का इस्तेमाल करना चाहता है।
10 अरब डॉलर की इस सनसनीखेज मांग के पीछे छिपी है बड़ी आर्थिक मजबूरी
पाकिस्तान द्वारा अमेरिका से 10 अरब डॉलर की इस भारी वित्तीय सहायता की मांग के पीछे उसकी डूबती हुई अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार की भारी किल्लत है। देश में महंगाई चरम पर है, ऊर्जा संकट गहराया हुआ है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की कड़ी शर्तों के कारण सरकार जनता को कोई राहत देने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है। ऐसे में, पाकिस्तान के हुक्मरानों को लगता है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों के वित्तीय संस्थानों पर दबाव बनाकर या उनके सामने सुरक्षा का रोना रोकर वे भारी-भरकम राहत पैकेज हासिल कर सकते हैं। हालांकि, वाशिंगटन के गलियारों में अब पाकिस्तान की इन चालबाजियों को बहुत अधिक तवज्जो नहीं दी जा रही है, क्योंकि अमेरिकी नीति निर्माताओं की प्राथमिकताएं अब पूरी तरह बदल चुकी हैं और वे भारत के साथ अपने सामरिक संबंधों को सबसे ज्यादा मजबूती दे रहे हैं।
चीन-पाकिस्तान संबंधों पर इस धोखे का क्या होगा दूरगामी असर
पाकिस्तान की इस गुप्त और अवसरवादी कूटनीति का सबसे बड़ा असर बीजिंग और इस्लामाबाद के रिश्तों पर पड़ना तय माना जा रहा है। चीन कभी भी अपने सामरिक निवेश और क्षेत्रीय प्रभाव के साथ इस तरह के विश्वासघात को आसानी से बर्दाश्त नहीं करता है। बीजिंग के रणनीतिकारों की पैनी नजर इस बात पर है कि कैसे पाकिस्तान एक तरफ उनसे अरबों डॉलर की मदद लेता है और दूसरी तरफ पश्चिमी देशों के सामने जाकर गिड़गिड़ाता है। यदि अमेरिका ने इस मांग को ठुकरा दिया और चीन को इस दोहरे खेल की पूरी सच्चाई का अहसास हो गया, तो पाकिस्तान दोनों तरफ से घिर जाएगा। भारत के सामरिक विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि पाकिस्तान की यह चालबाजी उसकी अंतहीन कूटनीतिक विफलताओं और दिवालिएपन की एक और बानगी मात्र है, जिसका भारत की सुरक्षा पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ने वाला है, बल्कि इससे पड़ोसी देश की विश्व मंच पर किरकिरी ही होनी तय है।
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