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तिब्बत में पहाड़ काटे, पोर्ट बनाए… नेपाल में ग्लेशियर फटने के पीछे ड्रैगन की करतूत? सैटेलाइट इमेज और एक्सपर्ट्स के बड़े खुलासे

उत्तरी नेपाल के रसुवा और भोटेकोशी बेसिन में तबाही मचाने वाले हालिया फ्लैश फ्लड और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। शुरुआती रिपोर्टों में इसे प्राकृतिक बादल फटना और ग्लेशियर का खिसकना बताया गया, लेकिन जैसे-जैसे जांच का दायरा बढ़ा है, इसके तार सीमा पार तिब्बत में चीन द्वारा किए जा रहे भारी-भरकम निर्माण कार्यों से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं।

पर्यावरणविदों और भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि इस महाविनाश का कारण केवल अत्यधिक बारिश नहीं है, बल्कि तिब्बत के अत्यंत नाजुक इकोलॉजिकल जोन में चीन की आक्रामक इंजीनियरिंग गतिविधियां हैं।

पहाड़ों पर बारूदी धमाके और ड्राई पोर्ट्स का अनियंत्रित जाल

चीन ने बीते कुछ वर्षों में नेपाल-तिब्बत सीमा (केरुंग-रसुवागढ़ी अक्ष) पर बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा तैयार किया है:

  • पहाड़ों की भारी कटाई और टनल निर्माण: ट्रांस-हिमालयन कनेक्टिविटी और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चीन ने तिब्बत के ऊंचे पहाड़ी दर्रों में सुरंगें बनाने के लिए लगातार भारी ब्लास्टिंग और डायनामाइट का इस्तेमाल किया है।

  • विशाल ड्राई पोर्ट्स और सड़कें: रसुवा बॉर्डर के नजदीक केरुंग में विशालकाय ड्राई पोर्ट, लॉजिस्टिक्स हब और चौड़े हाईवे बनाने के लिए लाखों टन मलबा नदियों और प्राकृतिक घाटियों में धकेला गया।

  • पर्माफ्रॉस्ट और टेक्टोनिक प्लेट्स में दरारें: भारी ब्लास्टिंग के कंपनों ने सदियों से जमे पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) और हिमालय की पहले से कमजोर विवर्तनिक परतों को ढीला कर दिया, जिससे ऊपरी झीलों और ग्लेशियरों की प्राकृतिक दीवारें कमजोर हो गईं।

ग्लेशियल झीलों पर दबाव और कृत्रिम रुकावटें

वैज्ञानिकों का आकलन है कि ल्हेंदे और भोटेकोशी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में पहाड़ों से भारी मलबा गिरने के कारण नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बार-बार बाधित हुआ:

  • डैमिंग और अचानक विस्फोट: जब तिब्बत की तरफ भूस्खलन का मलबा नदी के संकरे मोड़ों पर जमा हुआ, तो वहां अस्थायी प्राकृतिक झीलें बन गईं।

  • ग्लेशियर का खिसकना: कमजोर हो चुकी चट्टानी ढलानों पर जब भारी मात्रा में बर्फ और पानी का दबाव पड़ा, तो ग्लेशियर का विशाल हिस्सा टूटकर इन अस्थायी झीलों में गिरा, जिससे 'सुनामी' जैसा बहाव पैदा हुआ और नेपाल के निचले इलाकों में विनाशकारी फ्लड आ गया।

हाइड्रोलॉजिकल डेटा छिपाने की नीति ने बढ़ाया नुकसान

इस पूरे घटनाक्रम में चीन की डेटा अपारदर्शिता सबसे बड़ा विवाद बन चुकी है:

  • अपस्ट्रीम डेटा का अभाव: चीन ने अपने इलाके में बढ़ते जलस्तर, ग्लेशियल लेक के फैलाव या पहाड़ों के खिसकने की कोई भी रियल-टाइम सैटेलाइट व हाइड्रो-मीटियोरोलॉजिकल जानकारी नेपाल को समय पर नहीं दी।

  • समय पर अलर्ट न मिलना: यदि तिब्बत में ग्लेशियर फटने या नदी ब्लॉक होने की पूर्व चेतावनी मिल जाती, तो नेपाल के 11 हाइड्रो प्रोजेक्ट्स और दर्जनों पुलों के पास मौजूद सैकड़ों मजदूरों व स्थानीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा सकता था।

हिमालयी पारिस्थितिकी के साथ खिलवाड़ बना पूरे क्षेत्र के लिए खतरा

तिब्बत के पठार को 'दुनिया की छत' और 'तीसरा ध्रुव' (Third Pole) कहा जाता है। यहां की जलवायु और भू-संरचना बेहद नाजुक है। विशेषज्ञों की स्पष्ट राय है कि जब तक ट्रांस-बाउंड्री हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित और गैर-टिकाऊ निर्माण पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी नहीं होगी, तब तक ड्रैगन की यह इंजीनियरिंग पूरे दक्षिण एशिया के लिए इसी तरह बार-बार प्रलयंकारी साबित होती रहेगी।