
नेपाल की प्रमुख और तीव्र गति से बहने वाली नदियां सीधे तौर पर तिब्बती पठार और ट्रांस-हिमालयी घाटियों से निकलती हैं। हालिया प्राकृतिक आपदा के दौरान जब तिब्बत के ऊंचाई वाले इलाकों में अप्रत्याशित रूप से मूसलाधार बारिश और ग्लेशियल झीलों का फैलाव हो रहा था, तब निचले इलाके में बसा नेपाल पूरी तरह अंधेरे में रहा। डाउनस्ट्रीम देशों के लिए नदी के ऊपरी हिस्से (अपस्ट्रीम) का जलस्तर और प्रवाह दर जीवन-मरण का सवाल होता है, लेकिन बीजिंग की तरफ से समय पर कोई स्पष्ट चेतावनी या हाइड्रो-मीटियोरोलॉजिकल डेटा साझा नहीं किया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब सीमा पार से अचानक पानी का अप्रत्याशित दबाव बढ़ा, तो नेपाल के निचले पहाड़ी इलाकों और नदी तटवर्ती कस्बों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। मिनटों में नदियां खतरे के निशान को पार कर गईं और देखते ही देखते कई बस्तियां, पुल और संपर्क मार्ग जलमग्न हो गए।
ट्रांस-बाउंड्री डेटा शेयरिंग का अभाव: आपदा प्रबंधन में सबसे बड़ी रुकावट
अंतरराष्ट्रीय जल कूटनीति और आपदा प्रबंधन के नियमों के मुताबिक, सीमा पार बहने वाली नदियों के मामले में ऊपरी देश का यह मानवीय और तकनीकी दायित्व बनता है कि वह पानी के असामान्य बहाव, बांधों से जल निकासी या झीलों के टूटने की पूर्व सूचना निचले देश को दे। चीन लंबे समय से हिमालयी जलविज्ञान से जुड़े संवेदनशील आंकड़ों को रणनीतिक नियंत्रण के दायरे में रखता आया है।
नेपाल के जल संसाधन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 4 से 6 घंटे पहले भी सेटेलाइट या गेजिंग स्टेशनों का डेटा काठमांडू के आपदा नियंत्रण कक्ष के साथ साझा कर दिया जाता, तो संवेदनशील घाटियों से लोगों को सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर पहुंचा दिया जाता। यह तकनीकी देरी सैकड़ों बेबस नागरिकों के लिए जानलेवा साबित हुई।
नेपाल में क्यों बढ़ रहा है जनआक्रोश: ड्रैगन की दोहरी नीतियों पर सवाल
नेपाल में इस भयावह तबाही के बाद अब आम जनमानस और स्थानीय मीडिया में चीन के गैर-जिम्मेदाराना रवैये को लेकर कड़े सवाल उठने लगे हैं। बुनियादी ढांचे के निर्माण और बड़े निवेश के वादे करने वाले चीन ने उस नाजुक मोड़ पर सूचनाएं रोक लीं, जब लोगों की जान बचाने के लिए एक-एक सेकंड कीमती था।
नेपाल के सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों का तर्क है कि प्राकृतिक आपदाओं में राजनीतिक या कूटनीतिक सीमाओं से परे जाकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। तिब्बत की तरफ बने बांधों और वाटर-डाइवर्जन परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति स्पष्ट न होने के कारण नेपाल के अधिकारियों को यह अनुमान लगाने में भारी कठिनाई हुई कि नदियों में अचानक इतना विशालकाय जल प्रवाह कहां से और किस गति से उत्पन्न हुआ।
भारत का सक्रिय सहयोग बनाम चीन की रहस्यमयी कार्यशैली
इस संकट काल में एक तरफ जहां भारत ने तत्काल हेल्पलाइन नंबर जारी किए, भारतीय वायुसेना के परिवहन बेड़े को राहत सामग्री के साथ तैयार रखा और जमीनी समन्वय तेज किया, वहीं दूसरी तरफ चीन की ओर से नदियों के उद्गम स्थलों की पारदर्शी जानकारी का अभाव स्पष्ट दिखाई दिया। सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत के साथ डेटा शेयरिंग के स्थापित प्रोटोकॉल जहां निचले इलाकों में जान-माल की रक्षा में सहायक होते हैं, वहीं उत्तरी सीमा पर चीन की अपारदर्शिता नेपाल के लिए हमेशा एक बड़ा हाइड्रोलॉजिकल जोखिम बनी रहती है।
जल विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन के कारण तिब्बती पठार पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की घटनाएं और बढ़ेंगी। ऐसे में अगर बीजिंग ने बहुपक्षीय अर्ली वार्निंग मैकेनिज्म को नहीं अपनाया, तो हिमालयी क्षेत्र के निचले देशों में बार-बार ऐसी मानवीय त्रासदियां देखने को मिल सकती हैं।
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