
हिमालय के ऊंचे और दुर्गम तिब्बती पठार से अचानक नीचे उतरे एक अथाह जलसैलाब ने सीमावर्ती और निचले इलाकों में ऐसा भयावह मंजर पैदा किया, जिसे देखकर रूह कांप जाए। पहाड़ों से प्रचंड वेग के साथ आए पानी, कीचड़ और विशाल बोल्डरों के मलबे ने रास्ते में आने वाली हर चीज को तिनके की तरह उड़ा दिया। इस अप्रत्याशित जलप्रलय में 384 लोग बह गए, कंक्रीट की मजबूत पांच-पांच मंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह पानी में समा गईं और भारी-भरकम स्टील व आरसीसी पुल पलक झपकते ही धराशायी हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों और भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, यह कोई सामान्य मौसमी बाढ़ नहीं थी, बल्कि पहाड़ों के ऊपर बने विशालकाय प्राकृतिक जल अवरोध के टूटने से पैदा हुई एक अनियंत्रित आपदा थी।
तिब्बत के पहाड़ों पर कैसे बना जल का 'टाइम बम': भूस्खलन और प्राकृतिक बांध का सच
इस दिल दहला देने वाली त्रासदी की शुरुआत तिब्बत के अत्यंत संकरे और ऊंचे पहाड़ी गलियारों में हुई। भू-गर्भीय रिपोर्टों और सैटेलाइट इमेजरी के विश्लेषण से सामने आया कि अत्यधिक वर्षा और भू-गर्भीय हलचल के चलते एक विशाल पहाड़ का बड़ा हिस्सा टूटकर मुख्य नदी की संकरी घाटी में आ गिरा। इस विशालकाय भूस्खलन (Landslide) ने बहती नदी के प्राकृतिक मार्ग को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया।
नदी का रास्ता रुक जाने से उसके पीछे लाखों गैलन पानी जमा होने लगा और कुछ ही समय के भीतर एक विशालकाय कृत्रिम झील का निर्माण हो गया। स्थानीय रूप से इसे 'लैंडस्लाइड डैम' कहा जाता है। ऊपर से लगातार आ रहे पानी और पिघलती बर्फ के कारण इस मिट्टी-पत्थरों से बने कच्चे बांध पर दबाव बढ़ता चला गया। आखिरकार, कमजोर प्राकृतिक दीवार पानी के विकराल भार को नहीं संभाल पाई और एक भीषण धमाके जैसी आवाज के साथ टूट गई।
ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट (GLOF) का घातक असर
वैज्ञानिकों के अनुसार, केवल लैंडस्लाइड डैम ही नहीं, बल्कि तिब्बत के ऊंचे इलाकों में मौजूद ग्लेशियल झीलों का फटना (GLOF – Glacial Lake Outburst Flood) भी इस तबाही की मुख्य कड़ियों में से एक रहा। ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से उनके मुहाने पर मोरेन (कंकड़-पत्थर) के पीछे विशाल जल भंडार जमा रहते हैं।
जब इन झीलों में पानी की मात्रा सीमा से अधिक हो जाती है या कोई भारी हिमखंड टूटकर इनमें गिरता है, तो यह प्राकृतिक अवरोध ध्वस्त हो जाता है। जब कई हजार फीट की ऊंचाई से लाखों क्यूबिक मीटर पानी तीव्र ढलान पर नीचे गिरता है, तो उसकी गति और शक्ति किसी शक्तिशाली मिसाइल जैसी हो जाती है। यह पानी अपने साथ रास्ते की पूरी मिट्टी, पेड़ और विशालकाय चट्टानों को उखाड़ता हुआ नीचे बहता है, जिससे इसकी विनाशक क्षमता सामान्य पानी की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है।
5 मंजिला इमारतें हुईं जमींदोज, मजबूत पुलों का नामोनिशान मिटा
जब यह जलसैलाब घाटियों से गुजरते हुए नीचे बसे कस्बों और बस्तियों में पहुंचा, तो लोगों को सुरक्षित ठिकानों की ओर भागने का एक पल भी नहीं मिला। पानी की ऊंचाई और वेग इतना प्रचंड था कि नदी किनारे बनी पक्की 5 मंजिला ऊंची इमारतें अपनी नींव से उखड़कर सेकंडों में गहरे पानी में समा गईं। पानी के साथ बहकर आए वजनी बोल्डरों ने हथौड़े की तरह पुलों के मजबूत पिलरों पर प्रहार किया, जिससे वर्षों से खड़े भारी-भरकम पुल बीच से टूटकर बह गए।
सड़कें पूरी तरह से कट गईं, बिजली और संचार नेटवर्क ठप हो गए और समूचा इलाका मलबे के विशाल ढेर में तब्दील हो गया। इस अचानक आए मलबायुक्त प्रवाह (Debris Flow) में 384 लोगों की जान चली गई या वे गहरे बहाव में लापता हो गए। बचाव दलों के लिए भी प्रभावित इलाकों तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया क्योंकि मुख्य संपर्क मार्ग और पुल पूरी तरह नष्ट हो चुके थे।
ट्रांसबाउंड्री आपदा: क्यों निचले हिमालयी देशों के लिए बड़ा सबक है यह त्रासदी?
तिब्बत का पठार एशिया का 'वाटर टॉवर' माना जाता है, जहां से ब्रह्मपुत्र (यारलुंग त्सांगपो), सिंधु, सतलुज, कोशी और मेकांग जैसी प्रमुख नदियां निकलती हैं और भारत, नेपाल व अन्य पड़ोसी देशों में बहती हैं। तिब्बत के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में होने वाली कोई भी भूगर्भीय या मौसमी हलचल सीधे तौर पर निचले तटीय और सीमावर्ती इलाकों को खतरे में डाल देती है।
यह जलप्रलय इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सीमा पार (Transboundary) बहने वाली नदियों के ऊपरी इलाकों में वास्तविक समय पर निगरानी रखना कितना महत्वपूर्ण है। जब ऊपरी क्षेत्र में कोई कृत्रिम झील बनती है या ग्लेशियर झील का जलस्तर बढ़ता है, तो समय पर सैटेलाइट डेटा और अर्ली वार्निंग अलर्ट निचले देशों तक पहुंचना अनिवार्य है, ताकि समय रहते निचले इलाकों को खाली कराकर जन-धन के नुकसान को रोका जा सके।
आगे की चुनौती: सेटेलाइट मॉनिटरिंग और मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम
हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और सीस्मिक गतिविधियों के कारण ऐसी फ्लैश फ्लड की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इस त्रासदी ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल पारंपरिक नदी तटबंध बनाना सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अंतरिक्ष आधारित रडार इमेजिंग, नदियों पर स्वचालित जलस्तर सेंसर और सुदूर पहाड़ी इलाकों में हाई-टेक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने होंगे। जब तक प्राकृतिक खतरों का सटीक पूर्वानुमान लगाकर अग्रिम निकासी की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक पहाड़ों से अचानक उतरने वाला जलप्रलय ऐसी ही तबाही मचाता रहेगा।
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