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20 लाख रुपये और एक टूटता हुआ घर: जब सगी सास ही बन गई दामाद के हंसते-खेलते परिवार की सबसे बड़ी दुश्मन

शरीफ अहमद ,सीतापुर : कहते हैं कि पैसा इंसान की ज़रूरतें पूरी कर सकता है, लेकिन जब यही पैसा अंधा लालच बन जाए, तो सबसे पहले रिश्तों का कत्ल करता है। आज हम आपको एक ऐसी ही कड़वी हकीकत से रूबरू कराने जा रहे हैं, जिसे सुनकर आपका अपनों पर से भरोसा उठ जाएगा।

सोचिए, क्या कोई पत्नी सिर्फ इसलिए अपने पति को उसके बूढ़े मां-बाप और भाई-बहनों से अलग कर सकती है क्योंकि उसके बैंक अकाउंट में कुछ लाख रुपये जमा हैं? क्या कोई सास-ससुर अपने ही दामाद की गाढ़ी कमाई हड़पने के लिए पूरे परिवार को सड़क पर लाने की साज़िश रच सकते हैं?

जी हां, एक ऐसा ही हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां 15 से 20 लाख रुपये का बैंक बैलेंस देखते ही एक खुशहाल परिवार को साज़िश की सूली पर चढ़ा दिया गया।

कैसे शुरू हुआ रिश्तों में ज़हर घोलने का खेल?

यह कहानी एक सीधे-साधे और आम परिवार से शुरू होती है। भाई की शादी बड़े अरमानों के साथ हुई थी। घर में सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, लेकिन तभी पत्नी की नज़र अपने पति के बैंक अकाउंट पर पड़ी। अकाउंट में करीब 15 से 20 लाख रुपये जमा थे। इस बड़ी रकम को देखते ही पत्नी के मन में लालच ने जगह बना ली।

पति की इस मेहनत की कमाई की जानकारी पत्नी ने तुरंत फोन पर अपनी मां (लड़के की सास) को दे दी। बस, यहीं से शुरू हुआ रिश्तों के बीच दीवार खड़ी करने का वो घिनौना खेल, जिसने एक बेटे को उसके जन्म देने वाले मां-बाप से दूर कर दिया। सास और ससुर ने दामाद के इस पैसे को हड़पने के लिए जाल बुनना शुरू कर दिया। बेटे को इस कदर भड़काया गया कि वो अपने सगे मां-बाप, अपने भाई अब्दुल रहीम और अपनी अविवाहित बहन को भूलकर उस लालची ससुराल पक्ष की उंगलियों पर नाचने लगा।

मुहर्रम के दिन सूने घर में बड़ी वारदात

लालच की हद तो तब पार हो गई, जब ताज़िये वाले दिन (मुहर्रम के दिन) पूरा इलाका गमगीन था। हर तरफ लोग मजलिस और जुलूस में व्यस्त थे। इसी सूने मौके का फायदा उठाकर वो भाई अपनी पत्नी और ससुराल वालों के इशारे पर अचानक घर पहुंच जाता है। लेकिन वो परिवार से मिलने नहीं, बल्कि सब कुछ तबाह करने आया था।

  • गहनों पर साफ किया हाथ: घर के अंदर रखे सोने और चांदी के तमाम जेवरात, जो शायद बाकी भाई-बहनों की शादी के लिए जोड़कर रखे गए थे, उन्हें बड़ी चालाकी से निकाल लिया गया।

  • खुशियां समेटकर रफूचक्कर: घर के बाकी सदस्य जब तक कुछ समझ पाते, तब तक वो शख्स अपनी पत्नी के साथ मिलकर पूरे घर की खुशियां और जीवनभर की पूंजी समेटकर भाग चुका था।

चोरी खुद की और उल्टा पीड़ित परिवार पर ही केस!

इस मामले में साज़िश रचने वाले इतने शातिर निकले कि उन्होंने 'उल्टा चोर कोतवाल को डांटे' वाली कहावत को सच साबित कर दिया। घर से सारा सोना-चांदी साफ करने के बाद, अपनी चोरी को छुपाने के लिए ससुराल वालों ने एक खौफनाक कानूनी साज़िश रची।

उन्होंने खुद पीड़ित बनकर थाने में एक मनगढ़ंत और झूठी तहरीर (शिकायत) दे दी। इल्जाम लगा दिया भाई अब्दुल रहीम और उनके बूढ़े मां-बाप पर। साज़िश ऐसी रची गई ताकि असली पीड़ित पुलिस और कानून के चक्कर में फंस जाएं और ससुराल वाले मजे से उस रकम और चोरी के सोने पर ऐश कर सकें।

एक बड़ा सवाल: इस साज़िश की वजह से उस घर का क्या होगा, जहां अभी दो भाइयों की बारात उठनी बाकी है? उस बहन का क्या होगा जिसके हाथ पीले करने के लिए बूढ़े मां-बाप ने पाई-पाई जोड़कर थी?

इंसाफ का इंतज़ार: प्रशासन से गुहार

पैसों का लालच इंसान को कितना अंधा बना सकता है, यह घटना उसका जीता-जागता सबूत है। इस वक्त अब्दुल रहीम का पूरा परिवार गहरे सदमे में है। एक तरफ भाई के दूर जाने का गम है, तो दूसरी तरफ घर में हुई चोरी और ऊपर से पुलिस केस का झूठा डर।

हम स्थानीय प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारियों से यह मांग करते हैं कि इस मामले की निष्पक्ष जांच की जाए। बैंक ट्रांजैक्शन और कॉल डिटेल्स खंगाली जाएं, ताकि सच सामने आ सके। बेकसूर मां-बाप और भाई-बहनों को इस झूठे केस से बचाया जाए और लालची साज़िशकर्ताओं को सलाखों के पीछे भेजा जाए।