
News India Live, Digital Desk: पश्चिम एशिया में छिड़ा संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय तनाव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक बड़े आर्थिक कालचक्र की शुरुआत साबित हो सकता है। प्रख्यात भू-राजनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने ईरान युद्ध के विनाशकारी परिणामों को लेकर एक चौंकाने वाला दावा किया है। चेलानी के अनुसार, इस युद्ध का प्रभाव दशकों तक बना रहेगा और इससे दुनिया भर में भोजन की भारी कमी यानी ‘ग्लोबल फूड क्राइसिस’ पैदा हो सकती है।सप्लाई चेन ध्वस्त, रसोई पर बढ़ेगी महंगाई की मारब्रह्म चेलानी ने आगाह किया है कि ईरान और उसके आसपास के क्षेत्रों में अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ेगा। चूंकि यह क्षेत्र ऊर्जा और व्यापारिक मार्गों का केंद्र है, इसलिए परिवहन लागत में भारी इजाफा होगा। इसका सबसे बुरा असर उर्वरकों (Fertilizers) के उत्पादन और निर्यात पर पड़ेगा, जिससे खेती की लागत बढ़ेगी और अनाज के दाम आसमान छूने लगेंगे। आने वाले समय में गरीब और विकासशील देशों के लिए अपने नागरिकों का पेट भरना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।दशकों तक भुगतना होगा खामियाजाविशेषज्ञ का मानना है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। ईरान जैसे देश के साथ सीधा टकराव वैश्विक अर्थव्यवस्था के उन स्तंभों को हिला देगा जो पहले से ही रूस-यूक्रेन संकट के बाद से दबाव में हैं। चेलानी ने सोशल मीडिया और अपने लेखों के माध्यम से संकेत दिया है कि युद्ध के बाद होने वाला पुनर्निर्माण और शरणार्थी संकट दुनिया के सामने ऐसी चुनौतियां पेश करेगा, जिनका समाधान निकालने में पीढ़ियां बीत जाएंगी।ऊर्जा संकट और बदलती भू-राजनीतिईरान युद्ध न केवल खाद्यान्न बल्कि तेल और गैस की कीमतों में भी भारी उछाल लाएगा। चेलानी के अनुसार, अगर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग प्रभावित होते हैं, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोहराम मच जाएगा। इससे न केवल भारत जैसे तेल आयातक देशों की अर्थव्यवस्था चरमराएगी, बल्कि अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के बीच कूटनीतिक समीकरण भी पूरी तरह बदल जाएंगे।भारत के लिए क्या है संकेत?ब्रह्म चेलानी की यह चेतावनी भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए भी एक रेड सिग्नल है। वैश्विक खाद्यान्न संकट की स्थिति में देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को अब और भी फूंक-फूंक कर कदम रखने होंगे, ताकि युद्ध के इस वैश्विक दुष्परिणाम की लपटें घरेलू अर्थव्यवस्था को ज्यादा नुकसान न पहुंचा सकें।
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