
मध्य पूर्व (Middle East) में यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बढ़ते हमलों, लाल सागर में जहाजों की नाकेबंदी और सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे पर मंडराते संकट के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है। पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने खुलकर कहा कि सऊदी अरब को हूतियों के खिलाफ इजरायल द्वारा दी जा रही सैन्य व खुफिया मदद के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना चाहिए। ट्रंप ने इजरायल के सहयोग को "बेहद मददगार" बताते हुए यह दावा भी किया कि सऊदी अरब और इजरायल के बीच सामान्यीकरण यानी 'अब्राहम एकॉर्ड्स' (Abraham Accords) समझौते की संभावना अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गई है। लखनऊ से लेकर वाशिंगटन, तेल अवीव और रियाद तक अंतरराष्ट्रीय मामलों के रणनीतिकार अब इस बात का विश्लेषण कर रहे हैं कि क्या ट्रंप का यह दबाव दशकों पुरानी अरब-इजरायल कूटनीति के पूरे ढांचे को बदल कर रख देगा।
रियाद पर हूती हमलों की नई लहर और इजरायल का खुला ऑफर
पिछले कुछ हफ्तों के दौरान यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के भीतर अपनी आक्रामक कार्रवाइयों को तेज कर दिया है। हाल ही में राजधानी रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और तेल संयंत्रों को निशाना बनाकर किए गए घातक मिसाइल व ड्रोन हमलों के बाद सऊदी अरब की आंतरिक और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के प्रशासन ने सऊदी अरब को हवाई रक्षा प्रणाली (Air Defence Systems), रडार ट्रैकिंग और हूती ठिकानों पर संयुक्त खुफिया निगरानी साझा करने का सीधा प्रस्ताव दिया था। इजरायल का मानना है कि हूती विद्रोही न केवल लाल सागर में व्यापारिक जहाजों और इजरायली ठिकानों के लिए खतरा हैं, बल्कि वे पूरे खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर रहे हैं।
ट्रंप का कड़ा संदेश: सैन्य मदद और अब्राहम एकॉर्ड्स की वापसी
व्हाट्सएप और अंतरराष्ट्रीय मीडिया मंचों पर वायरल हो रहे ट्रंप के इस बयान ने सऊदी नेतृत्व पर सीधा राजनीतिक दबाव बनाया है। जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या सऊदी अरब को हूतियों के खिलाफ इजरायल की मदद लेनी चाहिए, तो उन्होंने बिना झिझक कहा, "हां, बिल्कुल लेनी चाहिए। इजरायल सऊदी अरब के लिए बहुत मददगार रहा है।" उन्होंने यह भी दावा किया कि सऊदी अरब इजरायल और अमेरिका दोनों के समर्थन से खुश है और अब्राहम एकॉर्ड्स दोबारा टेबल पर आ चुका है। ट्रंप की विदेश नीति का मुख्य एजेंडा खाड़ी के सुन्नी मुस्लिम देशों और इजरायल को एक साझा रक्षा छत्र के नीचे लाकर ईरान और उसके 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' (हूती, हिजबुल्लाह, हमास) को रणनीतिक रूप से घेरना रहा है।
प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का 'धर्मसंकट' और फिलिस्तीन का सवाल
ट्रंप की खुली अपील के बावजूद सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के लिए इजरायल की सैन्य मदद को आधिकारिक और सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना आसान नहीं है। गाजा युद्ध और बड़े पैमाने पर हुए जनहानि के बाद समूची अरब और मुस्लिम दुनिया में इजरायल के खिलाफ व्यापक जनआक्रोश बना हुआ है। सऊदी अरब ने बार-बार यह दोहराया है कि जब तक 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम राजधानी के साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र (Two-State Solution) का स्पष्ट और अपरिवर्तनीय रोडमैप तैयार नहीं होता, तब तक इजरायल के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए जाएंगे। यदि रियाद खुले तौर पर इजरायली सैन्य मदद लेता है, तो हूती और ईरान इसे 'सऊदी-यहूदी गठबंधन' बताकर पूरे इस्लामी जगत में प्रचारित करेंगे, जिससे सऊदी अरब की इस्लामिक दुनिया के नेतृत्वकर्ता की छवि को गहरा झटका लग सकता है।
क्या बदलेंगे मिडिल ईस्ट के सुरक्षा और रक्षा समीकरण
यदि पर्दे के पीछे जारी खुफिया सहयोग को औपचारिक रक्षा साझेदारी में बदल दिया जाता है, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे:
-
ईरान के खिलाफ साझा एयर डिफेंस ग्रिड: इजरायल के 'आयरन डोम', 'डेविड्स स्लिंग' और 'एरो' सिस्टम्स की तकनीक सऊदी अरब के 'पैट्रियट' मिसाइल डिफेंस को अभेद्य मजबूती दे सकती है, जिससे हूतियों के बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों को आसमान में ही नष्ट किया जा सकेगा।
-
लाल सागर और बाब-अल-मंदेब की सुरक्षा: सऊदी और इजरायली नौसेनाओं का अनौपचारिक समन्वय लाल सागर के उस संकरे समुद्री मार्ग को सुरक्षित कर सकता है, जहां से दुनिया का लगभग 12 प्रतिशत व्यापार गुजरता है।
-
अब्राहम एकॉर्ड्स का विस्तार: यदि सऊदी अरब किसी भी रूप में इजरायल के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाता है, तो ओमान, कुवैत और कतर जैसे अन्य खाड़ी देशों के रुख में भी नरमी आ सकती है।
-
क्षेत्रीय टकराव में बढ़ोतरी: हूती नेतृत्व पहले ही चेतावनी दे चुका है कि इजरायल के साथ किसी भी प्रकार का सऊदी गठबंधन यमन युद्ध को फिर से सीधे सऊदी शहरों के अंदर तक ले आएगा।
पर्दे के पीछे की साझेदारी या सार्वजनिक गठबंधन?
राजनयिक विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब तुरंत किसी सार्वजनिक सैन्य समझौते पर दस्तखत करने के बजाय अमेरिका के जरिए बैक-चैनल और गुप्त खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान (Backchannel Intelligence Sharing) को प्राथमिकता देगा। रियाद अपनी क्षेत्रीय तेल परियोजनाओं और 'विजन 2030' के महत्वाकांक्षी आर्थिक लक्ष्यों को सुरक्षित रखना चाहता है, जिसके लिए हूती हमलों का रुकना अनिवार्य है। ट्रंप की इस सीधी अपील ने सऊदी अरब को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां उसे अपनी संप्रभु सुरक्षा और मुस्लिम जगत में अपनी कूटनीतिक साख के बीच बेहद नाजुक संतुलन साधना होगा।
UK News
