
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अचानक उत्तर कोरिया के दौरे पर पहुंच गए हैं, जिससे पूरी दुनिया के रक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञ सन्न रह गए हैं। प्योंगयांग में तानाशाह किम जोंग उन और शी जिनपिंग की इस मुलाकात ने वैश्विक राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह से गरमा दिया है। इस दौरे के समय और इसके पीछे की टाइमिंग को लेकर अब कई तरह के बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं, क्योंकि इस मुलाकात के दूरगामी परिणाम पूरी दुनिया पर पड़ने वाले हैं।
अमेरिका और जापान की नींद उड़ाने की बड़ी तैयारी इस दौरे का सबसे पहला और सीधा असर प्रशांत महासागर क्षेत्र के सुरक्षा समीकरणों पर पड़ता दिख रहा है। जानकारों का मानना है कि चीन और उत्तर कोरिया की यह नजदीकियां सीधे तौर पर अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान के त्रिकोणीय गठबंधन को एक खुली चुनौती हैं। उत्तर कोरिया द्वारा लगातार किए जा रहे मिसाइल परीक्षणों के बीच शी जिनपिंग का वहां पहुंचना प्योंगयांग के हौसलों को और मजबूत करेगा। इस कदम से वॉशिंगटन और टोक्यो के रक्षा विभागों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि चीन और उत्तर कोरिया मिलकर इस पूरे क्षेत्र में एक नया सैन्य और रणनीतिक दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
क्या रूस के घोड़े पर लगाम लगाना है शी जिनपिंग का असली दांव इस दौरे का एक और बेहद दिलचस्प और छिपा हुआ पहलू भी सामने आ रहा है। पिछले कुछ समय से रूस और उत्तर कोरिया के बीच सैन्य और रणनीतिक रिश्ते बहुत तेजी से मजबूत हुए हैं, जिससे यूक्रेन युद्ध के बीच राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को एक नया और आक्रामक साथी मिल गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर कोरिया पर रूस के इस बढ़ते प्रभाव से चीन पूरी तरह सहज नहीं है। बीजिंग कभी नहीं चाहेगा कि उसके इस पड़ोसी देश पर मास्को का नियंत्रण हद से ज्यादा बढ़ जाए। ऐसे में शी जिनपिंग का यह दौरा किम जोंग उन को यह याद दिलाने के लिए भी हो सकता है कि उनका असली और सबसे बड़ा मददगार आज भी सिर्फ चीन ही है।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बदल जाएंगे सत्ता के समीकरण शी जिनपिंग और किम जोंग उन की इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात के बाद अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से बदलने की उम्मीद है। एक तरफ जहां वैश्विक प्रतिबंधों से घिरे उत्तर कोरिया को चीन के रूप में एक बड़ा आर्थिक और राजनीतिक सुरक्षा कवच मिल जाएगा, वहीं दूसरी तरफ चीन इसका इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ एक मजबूत मोहरे के रूप में करेगा। अब देखना यह होगा कि बीजिंग और प्योंगयांग की इस जुगलबंदी पर अमेरिका और उसके सहयोगी देश क्या जवाबी कदम उठाते हैं, क्योंकि इस दौरे ने एशिया की भू-राजनीति में एक नया अध्याय लिख दिया है।
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