
रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई सालों से चल रहा विनाशकारी युद्ध अब एक बेहद संवेदनशील और नए मोड़ पर पहुंच गया है। वैश्विक राजनीति के गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों और उनके बूते से यह जंग अब पूरी तरह बाहर हो चुकी है। चुनाव के दौरान और उसके बाद भी युद्ध को तुरंत रुकवाने का दम भरने वाले ट्रंप के समीकरण यहां फेल होते दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि अब अमेरिकी दखल के भरोसे बैठने के बजाय यूरोपीय देशों ने खुद आगे आकर मोर्चा संभाल लिया है।
यूरोप ने संभाली कमान, युद्ध रोकने की कवायद तेज महाविनाश की कगार पर खड़े इस युद्ध की तपिश सबसे ज्यादा यूरोप ही झेल रहा है। सुरक्षा और आर्थिक मोर्चे पर बढ़ते खतरे को देखते हुए यूरोपीय महाद्वीप के शक्तिशाली देशों ने इस खूनी संघर्ष को समाप्त करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। यूरोपीय नेताओं का मानना है कि यदि इस समय कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो जाएगी। इसी रणनीति के तहत यूरोपीय संघ और उसके सहयोगी देशों ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को टेबल पर लाने के लिए एक बेहद सख्त और सोची-समझी योजना तैयार की है।
पुतिन के सामने रखी गईं ये 5 सबसे बड़ी शर्तें यूरोपीय देशों ने रूस के साथ शांति वार्ता शुरू करने और युद्ध को तुरंत रोकने के लिए पुतिन प्रशासन के सामने 5 बेहद कड़े प्रस्ताव और शर्तें रखी हैं। इन शर्तों में सबसे पहली और प्रमुख शर्त यह है कि रूस यूक्रेन के संप्रभु क्षेत्रों से अपनी सेना को तुरंत पीछे हटाए। दूसरी शर्त के तहत युद्ध के दौरान कब्जे में ली गई संपत्तियों और क्षेत्रों के भविष्य को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना होगा। तीसरी शर्त में यूक्रेन की सुरक्षा की अंतरराष्ट्रीय गारंटी सुनिश्चित करने की बात कही गई है, ताकि भविष्य में ऐसा हमला दोबारा न हो। चौथी शर्त के रूप में युद्ध अपराधियों पर कार्रवाई और पांचवीं शर्त के तहत यूक्रेन के पुनर्निर्माण में वित्तीय सहयोग देने का दबाव बनाया जा रहा है।
क्रेमलिन का रुख और दुनिया की नजरें यूरोप की इस बड़ी कूटनीतिक घेराबंदी पर अब पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन शर्तों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। क्रेमलिन की ओर से हमेशा यह साफ किया जाता रहा है कि वह अपने हितों से समझौता नहीं करेगा, लेकिन यूरोप का यह एकजुट प्रयास पुतिन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यदि पुतिन इन शर्तों पर विचार करने के लिए सहमत होते हैं, तो यह वैश्विक शांति की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा, अन्यथा यह युद्ध आने वाले दिनों में और भी ज्यादा आक्रामक और खतरनाक रूप अख्तियार कर सकता है।
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