
News India Live, Digital Desk: पूरी दुनिया पर इस समय एक ऐसा डिजिटल खतरा मंडरा रहा है, जो पल भर में हमें आदिम युग में वापस ले जा सकता है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बीच अब समुद्र के भीतर बिछीं उन ‘इंटरनेट की नसों’ (Undersea Cables) पर संकट के बादल छा गए हैं, जिनके जरिए पूरी दुनिया का डेटा एक जगह से दूसरी जगह पहुँचता है। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे स्थित फाइबर ऑप्टिक केबल्स को निशाना बनाने की योजना बनाई है। यदि ऐसा होता है, तो भारत समेत पूरी दुनिया में इंटरनेट का ब्लैकआउट हो सकता है।लाल सागर: इंटरनेट का वो चोक पॉइंट जहाँ फंसी है दुनिया की जानलाल सागर और फारस की खाड़ी के नीचे हजारों किलोमीटर लंबा केबल नेटवर्क बिछा हुआ है। यह नेटवर्क एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ता है। वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक का लगभग 17% से 30% हिस्सा इन्हीं समुद्री रास्तों से होकर गुजरता है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने हाल ही में चेतावनी दी है कि इन केबल्स को नुकसान पहुँचाना उनकी रणनीतिक क्षमता में शामिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक धमकी नहीं, बल्कि एक ऐसा घातक वार है जो वैश्विक बैंकिंग, स्टॉक मार्केट और संचार व्यवस्था को पूरी तरह ठप कर सकता है।भारत पर क्या होगा असर? थम जाएगी डिजिटल इकोनॉमीभारत के लिए यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है। भारत की डिजिटल इकोनॉमी और आईटी सेक्टर पूरी तरह से इन समुद्री केबल्स पर निर्भर हैं।इंटरनेट की सुस्त रफ्तार: अगर ये केबल्स काटी जाती हैं, तो भारत में इंटरनेट की स्पीड में भारी गिरावट आएगी।क्लाउड सर्विसेज और AI पर संकट: अमेज़न, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के डेटा सेंटर्स जो खाड़ी देशों में स्थित हैं, उनका संपर्क टूट सकता है।ऑनलाइन भुगतान: यूपीआई (UPI) और नेट बैंकिंग जैसी सेवाएं बाधित हो सकती हैं, जिससे करोड़ों का लेनदेन प्रभावित होगा।ड्रोन हमलों और जहाजों के लंगर से भी खतरासिर्फ जानबूझकर की गई तोड़फोड़ ही नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान जहाजों की आवाजाही और ड्रोन हमलों से भी इन केबल्स को खतरा है। हाल ही में बहरीन और यूएई में डेटा सेंटर्स पर हुए संदिग्ध ड्रोन हमलों ने इस डर को और बढ़ा दिया है। अल्काटेल सबमरीन नेटवर्क्स जैसी बड़ी कंपनियों ने पहले ही इस क्षेत्र में अपने काम को ‘फोर्स मेज्योर’ (अनदेखा खतरा) बताते हुए रोक दिया है। मेटा (Meta) जैसी कंपनियों ने भी अपने अपकमिंग केबल प्रोजेक्ट्स को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।क्या है बचाव का रास्ता? एक्सपर्ट्स की बढ़ी चिंतारक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्र के नीचे इन केबल्स की सुरक्षा करना नामुमकिन के बराबर है। अगर कोई देश या संगठन इन्हें निशाना बनाता है, तो इन्हें ठीक करने में हफ्तों या महीनों का समय लग सकता है। भारत के दूरसंचार नियामक (TRAI) ने भी टेलीकॉम कंपनियों को वैकल्पिक रास्ते (Overland Routes) और इमरजेंसी बैकअप तैयार रखने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, समुद्र के नीचे की इन विशालकाय नसों का कोई तत्काल और पूर्ण विकल्प मौजूद नहीं है।
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