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नीली क्रांति से संवरती हाथरस की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वावलंबन की नई राह

उत्तर प्रदेश में नीली क्रांति को गति देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में केंद्र व राज्य सरकार की मत्स्य संपदा योजनाएं मील का पत्थर साबित हो रही हैं। इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक मछुआरों, मत्स्य पालकों और ग्रामीण युवाओं को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर उनकी आय को बढ़ाना है। देश में मत्स्य पालन क्षेत्र को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना संचालित की जा रही है, जो बुनियादी ढांचे के विकास और बायोफ्लॉक व रीसर्क्युलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम जैसी आधुनिक प्रणालियों को बढ़ावा देती है। इस योजना के अंतर्गत नए तालाबों की खुदाई और मत्स्य पालन की शुरुआत के लिए सरकार द्वारा भारी सब्सिडी प्रदान की जाती है। इसमें सामान्य और ओबीसी वर्ग के लाभार्थियों को इकाई लागत का 40 प्रतिशत अनुदान देय है, जबकि महिला, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लाभार्थियों के लिए यह अनुदान बढ़ाकर 60 प्रतिशत किया गया है। इसके साथ ही सघन मत्स्य पालन के लिए तालाबों में एयरेशन सिस्टम लगाने के लिए भी सरकार द्वारा विशेष प्रोत्साहन दिया जाता है।
केंद्र की इस योजना के समांतर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विशेष रूप से राज्य के ग्रामीण अंचलों और पट्टा धारकों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना चलाई जा रही है। इस योजना का मुख्य फोकस ग्राम सभा के उन तालाबों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है जिनका 10 वर्षीय पट्टा आवंटित हो चुका है। इन तालाबों के जीर्णाेद्धार और इनमें उत्तम गुणवत्ता के बीज, खाद व फीड जैसी इनपुट आवश्यकताओं के लिए सभी वर्गों के लाभार्थियों को 40 प्रतिशत तक की निवेश सहायता दी जाती है। इसके अतिरिक्त मछुआरों को पारंपरिक आजीविका के साधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से निषादराज बोट योजना के तहत लकड़ी की नाव और जाल क्रय करने के लिए सामान्य वर्ग को 40 प्रतिशत तथा महिला व अनुसूचित जाति वर्ग को 60 प्रतिशत का अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। उत्तर प्रदेश मत्स्य पालक कल्याण कोष के माध्यम से उत्पादित मछली को बाजार तक सुरक्षित पहुंचाने और उसकी बिक्री बढ़ाने के लिए मोपेड विद आइसबॉक्स जैसी परिवहन सुविधाएं भी प्रदान की जा रही हैं।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में कई प्रगतिशील उद्यमी सफलता की नई कहानी लिख रहे हैं। जनपद हाथरस के विकासखंड सहपऊ के ग्राम खोन्डा की निवासी श्रीमती कल्पना, जो हाईस्कूल उत्तीर्ण एक स्व-नियोजित उद्यमी हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उन्होंने वित्तीय वर्ष 2023-24 में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत मीठे जल में बायोफ्लॉक तालाब निर्माण की परियोजना शुरू की। इस 14 लाख रुपये की कुल लागत वाली परियोजना के लिए उन्हें विभाग की ओर से 60 प्रतिशत यानी 8.40 लाख रुपये की अनुदान सहायता प्राप्त हुई। वर्तमान में वे 0.10 हेक्टेयर क्षेत्र में पैंगेशियस प्रजाति की मछली का पालन कर रही हैं, जिससे प्रति वर्ष लगभग 100 क्विंटल का बंपर उत्पादन हो रहा है। करीब 5.50 से 6 लाख रुपये की वार्षिक निवेश लागत के साथ उनका कुल टर्नओवर 9 से 9.50 लाख रुपये तक पहुंच जाता है, जिससे उन्हें 2.50 से 3 लाख रुपये की शुद्ध वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। उनके इस प्रयास से क्षेत्र के 5 से 7 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार भी मिला है।
इसी प्रकार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के माध्यम से जनपद के विकासखंड मुरसान के ग्राम रामगढ़ निवासी इण्टरमीडिएट शिक्षित स्व-नियोजित उद्यमी श्री रक्षपाल सिंह ने भी इस दिशा में एक प्रेरक मिसाल कायम की है। उन्होंने वित्तीय वर्ष 2022-23 (क्रियान्वयन वर्ष 2023-24) में इस योजना के तहत 7.50 लाख रुपये की लागत से लघु रीसर्क्युलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (लघु आर०ए०एस०) की एक यूनिट स्थापित की, जिस पर उन्हें विभागीय सहयोग से 4.50 लाख रुपये का अनुदान मिला। उन्होंने अपनी इस परियोजना को ग्राम पुरदिलनगर में क्रियान्वित किया और वर्तमान में वे इस आधुनिक सिस्टम में पैंगेशियस पालन के साथ-साथ 0.20 हेक्टेयर क्षेत्र में भारतीय मेजर कार्प (आईएमसी) का भी सफलतापूर्वक उत्पादन कर रहे हैं। इस उद्यम से प्रति वर्ष 20 से 25 क्विंटल मछली का उत्पादन हो रहा है, जिससे लगभग 1.80 लाख रुपये का वार्षिक कारोबार और 80 हजार से 1 लाख रुपये तक की शुद्ध आय अर्जित हो रही है, साथ ही ग्रामीण स्तर पर 3 से 4 लोगों को आजीविका भी मिली है।
हाथरास जनपद के ही पुरदिलनगर निवासी इण्टरमीडिएट उत्तीर्ण एक अन्य महिला उद्यमी श्रीमती चेतना सिंह ने भी प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का लाभ उठाकर ग्रामीण संसाधनों के सही उपयोग की राह दिखाई है। वित्तीय वर्ष 2022-23 (क्रियान्वयन वर्ष 2023-24) में इस योजना के माध्यम से उन्होंने भी पुरदिलनगर में 7.50 लाख रुपये की लागत से लघु रीसर्क्युलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम की एक यूनिट की नींव रखी, जिस पर उन्हें नियमानुसार 60 प्रतिशत यानी 4.50 लाख रुपये की वित्तीय सहायता प्राप्त हुई। श्रीमती चेतना सिंह वर्तमान में आर०ए०एस० तकनीक से पैंगेशियस और इसके साथ ही 0.20 हेक्टेयर तालाब में भारतीय मेजर कार्प का उत्पादन कर रही हैं। उनके इस प्रोजेक्ट से भी सालाना 20 से 25 क्विंटल उत्पादन और 1.80 लाख रुपये का व्यवसाय हो रहा है, जिससे 80 हजार से 1 लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है और 3 से 4 स्थानीय लोगों को नियमित रोजगार मिला है।
इन सफल लाभार्थियों की प्रगति को देखकर क्षेत्र के अन्य ग्रामीण और किसान भी आधुनिक मत्स्य पालन की ओर आकर्षित व प्रोत्साहित हो रहे हैं। मत्स्य पालकों को कार्यशील पूंजी की कमी न हो, इसके लिए इन योजनाओं के समन्वय से मत्स्य किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा भी दी जाती है, जिसके माध्यम से बैंकों से बेहद कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इन सभी लाभार्थीपरक योजनाओं का लाभ उठाने के लिए उत्तर प्रदेश के इच्छुक मत्स्य पालकों को मत्स्य विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन पंजीकरण कराना होता है। योजना की विस्तृत जानकारी, आवश्यक दस्तावेजों और प्रोजेक्ट प्रस्ताव की प्रक्रिया के लिए  मत्स्य पालक जनपद स्तर पर जिला मत्स्य अधिकारी या मत्स्य पालक विकास अभिकरण कार्यालय से संपर्क करके भी सारी जानकारियां ले सकते हैं। सरकार द्वारा इन योजनाओं का लाभ पूरी पारदर्शिता के साथ सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में डीबीटी के माध्यम से भेजा जा रहा है, जो सही योजना, सरल प्रक्रिया और विभागीय सहयोग से ग्रामीण आत्मनिर्भरता का मार्ग सशक्त कर रही है।