
बिहार की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। बिहार विधान परिषद की 10 सीटों पर होने वाले चुनाव में बिना मतदान के ही पूरा नतीजा साफ हो गया है। नाम वापसी की समय सीमा समाप्त होने के बाद चुनावी मैदान में बचे सभी 10 उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया है। आगामी 18 जून को इन सीटों के लिए वोटिंग की तारीख तय की गई थी, लेकिन विपक्षी और सत्ताधारी दलों के समीकरण कुछ ऐसे बैठे कि मतदान की नौबत ही नहीं आई। इस बार के चुनाव में सत्ताधारी एनडीए (NDA) का पलड़ा पूरी तरह भारी रहा है, जिसके खाते में 10 में से 9 सीटें गई हैं, जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी राजद (RJD) को केवल 1 सीट से ही संतोष करना पड़ा है।
पहली बार सदन पहुंचे कई नए चेहरे, सर्टिफिकेट लेने उमड़ी दिग्गजों की भीड़
निर्विरोध निर्वाचन की आधिकारिक घोषणा होते ही पटना स्थित बिहार विधानसभा परिसर में हलचल तेज हो गई। विजयी घोषित किए गए उम्मीदवार एक-एक कर अपना निर्वाचन सर्टिफिकेट लेने के लिए सदन पहुंचने लगे। इस बार के परिषद चुनाव की सबसे खास बात यह रही कि सदन में कई नए चेहरों की एंट्री हो रही है। पहली बार सदन के सदस्य बनने वालों में जदयू (JDU) के निशांत कुमार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पवन सिंह शामिल हैं, जो राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। सर्टिफिकेट लेने पहुंचे नेताओं के चेहरों पर जीत की खुशी साफ देखी जा सकती थी। सदन परिसर में उनके समर्थकों ने फूल-मालाओं और नारों के साथ अपने नेताओं का जोरदार स्वागत किया।
जानिए किस पार्टी के कौन-कौन से चेहरे बने माननीय, किसका कितना रहा दबदबा
इस चुनाव में सीटों के गणित पर नजर डालें तो एनडीए ने एकजुटता दिखाते हुए अपने 9 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था और वे सभी बिना किसी विरोध के चुन लिए गए हैं। इनमें भाजपा और जदयू के प्रमुख चेहरों के साथ-साथ सहयोगी दलों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर, विपक्षी महागठबंधन की तरफ से केवल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुनील सिंह ने ही अपना नामांकन दाखिल किया था, जो लालू प्रसाद यादव के करीबी माने जाते हैं और वे दूसरी बार सदन के सदस्य चुने गए हैं। सभी 10 नवनिर्वाचित विधान पार्षदों (MLC) में से 9 सदस्यों का कार्यकाल पूरे 6 साल का होने वाला है, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद खाली हुई एक सीट पर उपचुनाव के तहत चुने गए जदयू के ललन प्रसाद का कार्यकाल 4 वर्षों का रहेगा।
नामांकन के आखिरी दिन ही तय हो गया था खेल, नहीं पड़ा एक भी वोट
इस बार बिहार एमएलसी चुनाव की पूरी प्रक्रिया बेहद दिलचस्प रही। 10 सीटों के लिए केवल 10 ही उम्मीदवारों ने पर्चा दाखिल किया था, जिसके बाद से ही यह तय माना जा रहा था कि किसी भी सीट पर वोटिंग की जरूरत नहीं पड़ेगी। स्क्रूटनी (नामांकन पत्रों की जांच) और नाम वापसी की अंतिम तिथि समाप्त होते ही चुनाव आयोग ने सभी प्रत्याशियों की निर्विरोध जीत पर मुहर लगा दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस निर्विरोध चुनाव ने राज्य में एनडीए के मजबूत संख्या बल और विपक्ष की बदली हुई रणनीति को साफ तौर पर दर्शाया है। सदन में प्रमाण पत्र हासिल करने के बाद सभी नए सदस्यों ने बिहार के विकास और जनता के मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाने का संकल्प जताया है।
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