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चीन के चक्रव्यूह में भारत की बड़ी सेंध नन्हे से देश तुवालु पहुंचे भारतीय मंत्री, बदल जाएगी प्रशांत महासागर की जियोपॉलिटिक्स

News India Live, Digital Desk: प्रशांत महासागर के नीले पानी के बीच बसे एक छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण देश ‘तुवालु’ में भारत ने अपनी कूटनीति का परचम लहरा दिया है। मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री पबित्र मार्गेरिटा ने तुवालु की ऐतिहासिक यात्रा कर न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई दी है, बल्कि ड्रैगन (चीन) के बढ़ते प्रभाव वाले इस क्षेत्र में भारत की मजबूत मौजूदगी दर्ज करा दी है। किसी भारतीय मंत्री की यह पहली तुवालु यात्रा है, जिसे वैश्विक राजनीति के विशेषज्ञ गेम चेंजर मान रहे हैं।प्रशांत महासागर के द्वीपीय देशों पर भारत का फोकसकेंद्रीय राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा की यह यात्रा भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और ‘सागर’ (SAGAR) विजन का एक अहम हिस्सा है। तुवालु जैसे देशों के साथ प्रगाढ़ होते रिश्ते यह बताते हैं कि भारत अब केवल बड़े देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशांत महासागर के उन छोटे द्वीपीय देशों (PICs) को भी प्राथमिकता दे रहा है जो जलवायु परिवर्तन और समुद्री सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील हैं। मार्गेरिटा ने तुवालु के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात कर बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन में सहयोग का हाथ बढ़ाया है।चीन की विस्तारवादी नीति को भारत का ‘मौन’ जवाबपिछले कुछ वर्षों में चीन ने प्रशांत महासागर के देशों को भारी कर्ज और निवेश के जाल में फंसाकर अपना सैन्य दबदबा बढ़ाने की कोशिश की है। भारत की यह सक्रियता सीधे तौर पर उस प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश है। भारत ने तुवालु को विश्वास दिलाया है कि वह एक ‘विश्वस्त साझेदार’ के रूप में उनके विकास में योगदान देगा, न कि कर्ज के जाल में फंसाएगा। इस यात्रा के दौरान समुद्री सुरक्षा और सूचना साझा करने जैसे गंभीर मुद्दों पर भी चर्चा हुई है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।जलवायु परिवर्तन की जंग में साथ खड़ा है नई दिल्लीतुवालु दुनिया के उन देशों में शामिल है जिन पर समुद्र का जलस्तर बढ़ने से डूबने का खतरा सबसे अधिक है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और अन्य मंचों के माध्यम से तुवालु की मदद करने का संकल्प दोहराया है। पबित्र मार्गेरिटा ने स्पष्ट किया कि भारत, ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर इन छोटे देशों की चिंताओं को वैश्विक मंचों पर उठाता रहेगा। इस ऐतिहासिक यात्रा ने यह साफ कर दिया है कि सुदूर प्रशांत में अब तिरंगे की चमक और अधिक बढ़ने वाली है।