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राहुल और अखिलेश के बाद अब ममता बनर्जी ने उठाई लाठी! फ्लॉप शो के बाद क्या फिर जिंदा हो पाएगा इंडिया गठबंधन

राहुल और अखिलेश के बाद अब ममता बनर्जी ने उठाई लाठी! फ्लॉप शो के बाद क्या फिर जिंदा हो पाएगा इंडिया गठबंधन

भारतीय राजनीति के फलक पर विपक्ष को एक बार फिर से खड़ा करने और उसे एक मजबूत धार देने की कवायद नए सिरे से शुरू होती दिख रही है। लगातार दो आम चुनावों यानी साल 2019 और साल 2024 के महामुकाबले में करारी शिकस्त और फ्लॉप शो का सामना करने के बाद विपक्षी कुनबा एक बार फिर आत्ममंथन के दौर से गुजर रहा है। केंद्र की सत्ता पर काबिज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को कड़ी चुनौती देने के इरादे से बने 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन की बिखरती कड़ियों को एक साथ पिरोने के लिए अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की फायरब्रांड नेता ममता बनर्जी ने खुद कमान संभाल ली है। राजनीतिक गलियारों में इस नए जुटान को लेकर चर्चाएं बेहद गर्म हैं।

लगातार दो हार के बाद विपक्ष के सामने साख का संकट यदि बीते दो लोकसभा चुनावों के इतिहास और आंकड़ों पर नजर डालें, तो विपक्षी पार्टियों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक बेहद निराशाजनक रहा था। भारी-भरकम दावों और बड़े-बड़े गठबंधनों के बावजूद जनता के बीच विपक्ष अपनी विश्वसनीयता साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। 2019 में जहां एकजुटता की कोशिशें धरी की धरी रह गईं, वहीं 2024 के चुनाव आते-आते 'इंडिया' अलायंस बनने के तुरंत बाद ही उसमें आपसी खींचतान और बगावत के सुर तेज हो गए थे। चुनाव खत्म होते ही कई क्षेत्रीय दल इस गठबंधन से छिटक गए, जिससे यह पूरा मोर्चा ताश के पत्तों की तरह बिखरा हुआ नजर आने लगा था। अब इस पुराने फ्लॉप शो के दाग को धोने के लिए नए सिरे से बिसात बिछाई जा रही है।

बिखरे हुए 'इंडिया' गठबंधन को जोड़ने की ममता की नई रणनीति इस समय विपक्ष के भीतर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस बिखरे हुए कुनबे को एक मंच पर वापस कैसे लाया जाए। इस मुश्किल काम को अंजाम देने के लिए ममता बनर्जी अब सबसे आगे खड़ी दिखाई दे रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी अच्छी तरह जानती हैं कि बिना मजबूत क्षेत्रीय क्षत्रपों के सहयोग के दिल्ली की गद्दी का रास्ता तय नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि उन्होंने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, और वामपंथियों के साथ वैचारिक मतभेदों को किनारे रखकर एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम (CMP) के तहत सभी को जोड़ने के लिए अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला शुरू कर दिया है। ममता का यह प्रयास विपक्ष के लिए संजीवनी साबित हो सकता है।

क्या क्षेत्रीय नेताओं के अहंकार के बीच बन पाएगी बात ममता बनर्जी की इस नई पहल के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और क्षेत्रीय हित हैं। अतीत में भी यह देखा गया है कि चुनाव पास आते ही सीटों के बंटवारे और प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर गठबंधन के भीतर ही सिरफुटव्वल शुरू हो जाती है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, बिहार में मजबूत क्षेत्रीय दल और दक्षिण भारत के क्षत्रपों को एक ही पटरी पर लंबे समय तक बनाए रखना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। अब देखना यह होगा कि 2019 और 2024 के बुरे अनुभवों से सबक लेकर क्या यह दल अपने आपसी अहंकार को भुलाकर ममता बनर्जी के इस एकजुटता मिशन को कामयाब बनाने में सहयोग करते हैं या फिर विपक्ष का यह नया जुटान भी महज एक और नाकाम कोशिश बनकर रह जाएगा।