
महिला जीवन का सबसे खूबसूरत, संवेदनशील और बदलाव से भरा दौर यदि कोई होता है, तो वह निश्चित रूप से मातृत्व यानी प्रेग्नेंसी का समय होता है। जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो उसके शरीर और मन दोनों स्तर पर कई प्रकार के बड़े और गहरे बदलाव हो रहे होते हैं। इस दौरान होने वाली मां को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए परिवार के बुजुर्गों, दोस्तों और रिश्तेदारों द्वारा तरह-तरह की सलाह और नसीहतों का दौर शुरू हो जाता है। सदियों से हमारे समाज में प्रेग्नेंसी को लेकर कई तरह की लोक-कथाएं, दबी-छिपी मान्यताएं और पारंपरिक बातें चली आ रही हैं, जिन्हें लोग बिना किसी वैज्ञानिक पुष्टि के आँख मूंदकर सच मान लेते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) और स्त्री रोग विशेषज्ञों का मानना है कि मातृत्व के इस सफर में इन झूठी बातों या मिथकों पर भरोसा करना भावी मां और उसके आने वाले बच्चे दोनों की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि हम सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करने के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों और डॉक्टर की सलाह पर अमल करें।
पहला और सबसे बड़ा मिथक: गर्भवती महिला को हमेशा दो लोगों के बराबर खाना चाहिए
प्रेग्नेंसी के दौरान हमारे समाज में सबसे ज्यादा जो बात सुनने को मिलती है, वह यह है कि अब से होने वाली मां को दो लोगों के बराबर यानी सामान्य से दोगुना भोजन खाना चाहिए, ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे का सही पोषण हो सके। यह एक ऐसा सबसे बड़ा और प्रचलित मिथक है जिसे लोग सबसे ज्यादा सच मानते हैं। डॉक्टरों और डाइटीशियन का साफ तौर पर कहना है कि गर्भावस्था के दौरान शरीर को निश्चित रूप से अधिक कैलोरी और पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि आप जरूरत से ज्यादा और भारी खाना खाना शुरू कर दें। जरूरत से ज्यादा खाने से महिला का वजन तेजी से बढ़ सकता है, जिससे जेस्टेशनल डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और नॉर्मल डिलीवरी में जटिलताएं आने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। भोजन की मात्रा दोगुनी करने के बजाय आहार की गुणवत्ता (Quality of Food) पर ध्यान देना चाहिए, जिसमें प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, विटामिंस और फोलिक एसिड से भरपूर संतुलित चीजें शामिल हों।
दूसरा मिथक: गर्भावस्था में व्यायाम या शारीरिक गतिविधियां करना है हानिकारक
एक और बेहद आम भ्रांति यह फैली हुई है कि गर्भवती महिलाओं को नौ महीने तक पूरी तरह से आराम करना चाहिए और बिस्तर से उठकर किसी भी प्रकार का शारीरिक श्रम या व्यायाम (Exercise) नहीं करना चाहिए। लोगों का ऐसा मानना होता है कि हिलने-डुलने या कसरत करने से गर्भ में पल रहे बच्चे को चोट पहुंच सकती है या मिसकैरेज का खतरा हो सकता है। जबकि स्त्री रोग विशेषज्ञों का यह तर्क है कि यदि प्रेग्नेंसी पूरी तरह से सामान्य और स्वस्थ (Normal Pregnancy) है, तो हल्के व्यायाम, वॉक और योगासन करना मां और बच्चे दोनों के लिए वरदान साबित होते हैं। नियमित रूप से हल्की शारीरिक गतिविधि करने से शरीर में रक्त का संचार बेहतर होता है, मांसपेशियों की जकड़न दूर होती है, प्रसव के दौरान होने वाला दर्द सहन करने की क्षमता बढ़ती है और मानसिक तनाव कम होता है। हां, किसी भी प्रकार का भारी वजन उठाने या कठिन कसरत करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लेना और उनकी देखरेख में ही योग करना अनिवार्य होता है।
तीसरा मिथक: प्रेग्नेंसी के दौरान सफर करना पूरी तरह से है असुरक्षित
अक्सर परिवार के बुजुर्ग महिलाओं को सलाह देते हैं कि गर्भधारण करने के बाद से लेकर बच्चे के जन्म तक घर से बाहर कदम नहीं रखना चाहिए और किसी भी तरह के सफर (Travel) से पूरी तरह से बचना चाहिए। यह डर फैला रहता है कि कार, बस या ट्रेन के झटकों से गर्भस्थ शिशु पर बुरा असर पड़ सकता है। इस बात में थोड़ी बहुत सच्चाई केवल शुरुआती तीन महीनों और अंतिम चरण के कुछ हफ्तों के लिए हो सकती है, जब शरीर अत्यधिक संवेदनशील होता है, लेकिन पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान यात्रा करना प्रतिबंधित नहीं है। डॉक्टर मानते हैं कि प्रेग्नेंसी की दूसरी तिमाही (Second Trimester) यानी चौथे से छठे महीने के बीच का समय यात्रा करने के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है। इस दौरान महिलाएं सावधानी बरतते हुए और डॉक्टर की अनुमति लेकर आरामदायक सफर कर सकती हैं, बशर्ते उन्हें किसी प्रकार की गंभीर चिकित्सीय जटिलता या ब्लीडिंग जैसी समस्या न हो।
चौथा और पांचवां मिथक: घी खाने से होती है नॉर्मल डिलीवरी और पेट के आकार से तय होता है लिंग
प्रेग्नेंसी के आखिरी महीनों में गर्भवती महिलाओं को जमकर घी खाने की सलाह दी जाती है, इस अंधविश्वास के साथ कि इससे पेट चिकना हो जाता है और डिलीवरी बहुत आसानी से यानी नॉर्मल हो जाती है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार घी खाने का बच्चे के जन्म के रास्ते या नॉर्मल डिलीवरी की प्रक्रिया से दूर-दूर तक कोई वैज्ञानिक संबंध नहीं है। अत्यधिक घी खाने से केवल महिला का वजन और कोलेस्ट्रॉल ही बढ़ता है। इसके अलावा, एक और अजीब मिथक यह है कि महिला के पेट का आकार देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि गर्भ में बेटा है या बेटी। यह पूरी तरह से बेबुनियाद है, क्योंकि पेट का आकार महिला की रीढ़ की हड्डी की बनावट, बच्चे की पोजीशन और गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूइड की मात्रा पर निर्भर करता है। इसलिए इन सभी मिथकों से दूर रहें और एक स्वस्थ मातृत्व का आनंद लें।
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