
हिमालय की गोद में बसे नेपाल के ऊंचे पहाड़ों पर एक बार फिर बड़े प्राकृतिक संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग और तेजी से बढ़ते तापमान के कारण नेपाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद विशाल हिमनद (Glaciers) रिकॉर्ड गति से पिघल रहे हैं। इन पिघलते ग्लेशियरों के कारण पहाड़ों के ऊपर सैकड़ों खतरनाक कृत्रिम झीलें बन चुकी हैं, जिन्हें वैज्ञानिक 'टिकिंग टाइम बम' मान रहे हैं। अगर ये झीलें अपने प्राकृतिक तटबंधों को तोड़कर फटती हैं, तो यह नेपाल और नीचे की ओर बसे भारतीय मैदानी इलाकों में भारी तबाही मचा सकती हैं।
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का बढ़ता जोखिम
पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार, सबसे बड़ा खतरा 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) से है। जब अत्यधिक तापमान या भूकंपीय हलचल के कारण ग्लेशियर की बर्फ पिघलती है, तो पत्थरों और मलबे से बने प्राकृतिक बांधों पर पानी का दबाव अचानक बढ़ जाता है। बांध टूटने पर लाखों गैलन पानी, कीचड़ और भारी बोल्डर्स के साथ नीचे की घाटियों में सुनामी जैसी गति से बहता है। नेपाल के इम्जा (Imja), चो रोल्पा (Tsho Rolpa) और थुलगी जैसी प्रमुख हिमनद झीलें इस समय गंभीर खतरे की श्रेणी में शामिल हैं।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान का घातक असर
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है। पिछले कुछ दशकों में नेपाल में हजारों छोटी-बड़ी हिमनद झीलें बनी हैं, जिनमें से 20 से अधिक झीलें बेहद संवेदनशील मानी गई हैं। लगातार हो रहे हिमस्खलन (Avalanche) और चट्टानों के खिसकने से इन झीलों के किनारे किसी भी समय टूट सकते हैं, जिससे निचले रिहायशी इलाकों को संभलने का मौका तक नहीं मिलेगा।
भारत के सीमावर्ती राज्यों पर भी मंडरा रहा असर
नेपाल से निकलने वाली कोसी, गंडक और करनाली जैसी प्रमुख नदियां सीधे भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं। यदि नेपाल के उच्च क्षेत्रों में कोई बड़ा जल प्रलय आता है, तो इसका सीधा असर सीमावर्ती भारतीय राज्यों में आकस्मिक बाढ़ (Flash Flood), बुनियादी ढांचे के विनाश और कृषि भूमि के जलमग्न होने के रूप में सामने आएगा। इसी कारण दोनों देशों की आपदा प्रबंधन एजेंसियां हिमालयी जलक्षेत्रों की उपग्रह निगरानी (Satellite Monitoring) तेज करने पर जोर दे रही हैं।
अर्ली वार्निंग सिस्टम और बचाव की तैयारी
विशेषज्ञों का मानना है कि इस खतरे को पूरी तरह टाला नहीं जा सकता, लेकिन आधुनिक तकनीक के जरिए नुकसान को न्यूनतम किया जा सकता है। नेपाल सरकार अंतरराष्ट्रीय सहयोग से संवेदनशील झीलों में साइफन विधि के जरिए पानी के स्तर को कम करने की कोशिश कर रही है। साथ ही निचले इलाकों में स्वचालित सायरन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) स्थापित की जा रही है ताकि आपात स्थिति में स्थानीय ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों पर तुरंत पहुंचाया जा सके।
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