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News India Live, Digital Desk: आज यानी 21 मार्च 2026 (शनिवार) को देशभर में सिंधी समाज का सबसे बड़ा पर्व ‘चेटीचंड’ (Cheti Chand) बेहद उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन सिंधी नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है और इसी दिन इष्ट देव भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव (झूलेलाल जयंती) मनाया जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर सिंधी बाहुल्य इलाकों में भव्य शोभायात्राएं (बहराणा साहिब) निकाली जा रही हैं और मंदिरों में ‘लाल साईं’ के जयकारे गूंज रहे हैं।कौन हैं भगवान झूलेलाल? (वरुण देव के अवतार)धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान झूलेलाल को जल के देवता ‘वरुण देव’ का अवतार माना जाता है। सिंधी समाज उन्हें ‘लाल साईं’, ‘उडेरो लाल’ और ‘वरुण देव’ के नाम से पूजता है। उनका स्वरूप अत्यंत सौम्य है—वे एक विशाल मछली (पल्ले) पर विराजमान हैं, उनके हाथ में एक पवित्र ग्रंथ और माला है, और वे सफेद दाढ़ी व शाही पोशाक में नजर आते हैं। उन्हें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में सम्मान प्राप्त है; मुस्लिम उन्हें ‘ख्वाजा खिज्र’ या ‘जिंदा पीर’ के रूप में भी जानते हैं।पौराणिक कथा: जब ‘मिरख शाह’ के आतंक से कांप उठा था सिंधभगवान झूलेलाल के जन्म की कथा 10वीं शताब्दी के सिंध (अब पाकिस्तान) से जुड़ी है। उस समय वहां का शासक मिरख शाह बेहद क्रूर था और हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन करा रहा था। त्रस्त होकर सिंधी हिंदुओं ने सिंधु नदी के तट पर 40 दिनों तक कठिन तपस्या (चालीहा साहिब) की। भक्तों की पुकार सुनकर जल से आकाशवाणी हुई कि वे नसरपुर के रतनराय के घर अवतार लेंगे। चैत्र शुक्ल द्वितीया को ‘उडेरो लाल’ का जन्म हुआ, जिन्होंने अपनी दैवीय शक्तियों से मिरख शाह का अहंकार तोड़ा और सांप्रदायिक सौहार्द की स्थापना की।चेटीचंड की पूजा विधि और ‘बहराणा साहिब’आज के दिन सिंधी परिवारों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है:अक्खा (Akha): पूजा के दौरान चावल और चीनी का प्रसाद (अक्खा) जल में विसर्जित किया जाता है।बहराणा साहिब: एक सुंदर लकड़ी के मंदिर (मोड) को फूलों, दीपों और फल-मिश्री से सजाया जाता है, जिसे गाजे-बाजे के साथ नदी या जलाशय तक ले जाया जाता है।पल्लव (Pallav): पूजा के अंत में सामूहिक रूप से पल्लव (दुआ) मांगी जाती है, जिसमें पूरे विश्व के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।सिंधी नव वर्ष और सांस्कृतिक महत्वचेटीचंड का पर्व सिंधी समुदाय की पहचान और उनकी अटूट आस्था का प्रतीक है। आज के दिन लोग एक-दूसरे को “चेटीचंड जूं लख लख बधाईयूं” और “आयो लाल, झुलेलाल” कहकर बधाई दे रहे हैं। बाजारों और सामुदायिक केंद्रों पर सिंधी लोक नृत्य ‘छेज’ और पारंपरिक भजनों का आयोजन हो रहा है। सिंधी व्यंजनों, जैसे ‘तहरी’ (मीठे चावल) और ‘छोले’ का प्रसाद भी बांटा जा रहा है।
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