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Kalashtami 2026 : आखिर क्यों काल भैरव ने काट दिया था ब्रह्मा जी का पांचवां सिर? जानें इस खौफनाक दंड के पीछे की पूरी कहानी

News India Live, Digital Desk: हिंदू धर्म में कालाष्टमी का दिन भगवान शिव के रौद्र रूप ‘काल भैरव’ की उपासना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। तंत्र-मंत्र और बाधाओं से मुक्ति के लिए काल भैरव की शरण में जाना सबसे अमोघ उपाय है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शांत और सौम्य रहने वाले महादेव को ‘भैरव’ जैसा भयंकर रूप क्यों धारण करना पड़ा? पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के अहंकार को तोड़ने और उनके पांचवें सिर को धड़ से अलग करने के लिए ही काल भैरव का प्राकट्य हुआ था। आइए जानते हैं इस अद्भुत और रहस्यमयी कथा के पीछे का सच।जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच छिड़ा ‘श्रेष्ठता’ का विवादशिव पुराण के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। विवाद इतना बढ़ा कि इसे सुलझाने के लिए समस्त देवताओं ने वेदों और ऋषियों से परामर्श लिया। वेदों ने सर्वसम्मति से भगवान शिव को सर्वोच्च शक्ति और परमेश्वर घोषित किया। भगवान विष्णु ने तो इस निर्णय को सहर्ष स्वीकार कर लिया, लेकिन ब्रह्मा जी अपने अहंकार वश भगवान शिव को सर्वोच्च मानने को तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी का अहंकार और शिव का अपमानकहा जाता है कि उस समय ब्रह्मा जी के पांच सिर हुआ करते थे। अहंकार में डूबे ब्रह्मा जी के पांचवें मुख ने भगवान शिव के बारे में अपमानजनक शब्द कहे और उनकी निंदा की। महादेव के प्रति इस अनादर को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उनके इसी प्रचंड क्रोध से एक दिव्य ज्योति पुंज प्रकट हुआ, जिससे एक भयानक स्वरूप वाले पुरुष का जन्म हुआ। वह और कोई नहीं, साक्षात ‘काल भैरव’ थे।क्यों काटा गया ब्रह्मा जी का पांचवां सिर?भगवान शिव के आदेश पर काल भैरव ने अपनी उंगली के नाखून से ब्रह्मा जी के उस पांचवें सिर को काट दिया, जिसने महादेव का अपमान किया था। जैसे ही वह सिर कटा, ब्रह्मा जी का अहंकार चूर-चूर हो गया और उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। हालांकि, इस घटना के बाद काल भैरव पर ‘ब्रह्म-हत्या’ का दोष लग गया और वह कटा हुआ सिर उनके हाथ से चिपक गया। शिव के आदेश पर काल भैरव को इस पाप से मुक्ति पाने के लिए तीनों लोकों की यात्रा करनी पड़ी, जिसका अंत काशी (वाराणसी) में हुआ।काशी के कोतवाल और कालाष्टमी का महत्वजब काल भैरव काशी पहुँचे, तो ब्रह्मा जी का वह कपाल (सिर) उनके हाथ से छूटकर गिर गया। तब महादेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे काशी के रक्षक और ‘कोतवाल’ कहलाएंगे। कालाष्टमी के दिन जो भक्त काल भैरव की पूजा करते हैं, उनके जीवन से भय, रोग और शत्रुओं का नाश होता है। विशेषकर शनिवार और मंगलवार को पड़ने वाली कालाष्टमी पर भैरव चालीसा का पाठ और कुत्ते को भोजन कराना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।भय पर विजय पाने का पर्व है कालाष्टमीआध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार का अंत निश्चित है, चाहे वह देवताओं में ही क्यों न हो। काल भैरव का स्वरूप भले ही डरावना हो, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत दयालु और रक्षक हैं। आज के दिन मंदिर जाकर भगवान काल भैरव के दर्शन करना और सरसों के तेल का दीपक जलाना जीवन की बड़ी से बड़ी मुश्किलों को हल कर सकता है।